शख्सियत : हार दर हार, फिर भी ना टूटा, जनता से प्यार ..
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हर हार में भी जीत की एक कहानी छिपी होती है,छोटी सी उम्मीद में भी बड़ी ताकत बसी होती ही... ऐसी ही सोच मथुरा के प्रमुख बाल रोग विशेषज्ञ एवं प्रमुख समाज सेवी डॉ.अशोक अग्रवाल की है जो दो बार विधान सभा एवं एक बार नगरपालिका अध्यक्ष का चुनाव हारने के बाद ना तो उन्होंने समाज सेवा से नाता तोड़ा है और ना ही राजनीति का दामन छोड़ा है।
मथुरा शहर में छोटी सी हलवाई की दुकान चलाने वाले केशव देव अग्रवाल का जन्म 15 जुलाई 1954 को मथुरा में हुआ। चार भाई एवं 05 बहनों में छठवें नंबर के डा. अशोक अग्रवाल की पढ़ाई शहर के स्कूलों में हुई इसके बाद एमबीबीएस में दाखिला लिया उस समय मात्र 200 रूपये की फीस जमा करना मुश्किल हुआ तो इधर उधर फीस की व्यवस्था कर पढ़ाई पूरी की और बच्चों का इलाज शुरू कर दिया । जब कि सबसे बड़े देवकी नंदन गुप्ता (डीएन गुप्ता) को केंद्र में सरकारी नौकरी में लग गए तीसरे भाई सतीश चंद अग्रवाल ने इंजीनियर तो चौथे भाई राजीव अग्रवाल इंटर तक की पढ़ाई बा मुश्किल कर सके। सतीश चंद एवं राजीव दोनों भाइयों ने पिता का मिठाई का व्यापार संभाला और आज बृजवासी मिष्ठान के नाम से देश में जाना जाता है जब उनका होटल का भी बड़ा कारोबार है। जब कि डा. अशोक अग्रवाल की आज प्रमुख बाल रोग विशेषज्ञ के रूप में बड़ी पहचान है।बचपन से जहां वह पढ़ाई में तेज थे वहीं सामाजिक एवं राजनीति भी उनका शौक था । यही कारण था कि एस एन मेडिकल कॉलेज आगरा में पढ़ाई के दौरान जूनियर डाक्टर एसोशिएशन के सेकेट्री बन गए। इसके बाद सामाजिक संस्था जे सी के निर्विरोध अध्यक्ष,सचिव चुने गए। इसी तरह जायंट्स, रोटरी क्लब,आईएमए, आई एपी संस्थान,रेडक्रॉस सोसायटी,प्रथम पहल फाउंडेशन,सारथी परिवार आदि सहित अनेकों सामाजिक संस्थाओं से जुड़कर सामाजिक कार्यों में बढ़ चढ़कर भाग लिया। जब कि सपा,बसपा महानगर के अध्यक्ष सहित विभिन्न राजनीतिक पार्टियों से जुड़कर वर्ष 2012 में नगर पालिका मथुरा के अध्यक्ष पद पर उनकी पत्नी लत अग्रवाल ने चुनाव लड़ा लेकिन उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा,इसी वर्ष समाजवादी पार्टी से मथुरा - वृंदावन विधान सभा सीट से डा. अशोक अग्रवाल ने चुनाव लड़ा जिसमें मात्र 1300 करीब मतों से चुनाव हार गए। इसके बाद पुनः 2017 में विधान सभा का चुनाव लड़ा और हार का सामना करना पड़ा। जब कि 2022 में उन्होंने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया। लेकिन राजनीतिक एवं सामाजिक सक्रियता उनकी लगातार आज तक बनी हुई। आज भी चाहे वह किसी भी राजनीतिक पार्टी के नेता कार्यकर्ता या व्यापारिक - सामाजिक संगठन हों चाहे उनके पदाधिकारियों के यहां शोक सभा या उठावनी,विवाह हो या बर्थडे पार्टी हो अथवा कोई सामाजिक ,सांस्कृतिक कार्यक्रम हों अपने क्लीनिक को छोड़कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। यही कारण है जहां भी जाते हैं हर व्यक्ति उनके व्यवहार का कायल हो जाता है और उनसे फिर से चुनाव लड़ने और पूरा सहयोग करने का वायदा करते हैं। डा. अशोक अग्रवाल से जब जन भावनाओं को देखते हुए पुनः विधान सभा चुनाव लड़ने के बारे में सवाल किया तो कहा कि अगर राजनीतिक पार्टियों ने ऑफर दिया और जनता ने साथ दिया तो वह 2027 का विधान सभा चुनाव लड़ेंगे । डा. अशोक अग्रवाल की उम्र 71साल भले ही हो गई हो। लेकिन समाज सेवा और राजनीति में आज भी जिस तरह सक्रिय हैं उनके हौसलों को देखकर कहा जा सकता है कि...जो जड़ों से जुड़ा है, वही आंधियों में भी खड़ा है , जिसे भरोसा है खुद पर ,वो कहां मुश्किलों से डरा है ...अगर ऐसा जज्बा हो तो इंसान असंभव को भी संभव में बदल सकता है।
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कोरोना में बचाई गरीब मासूम बच्चे की जान
ये प्यारी प्यारी राजनीति हम सबको जुदा कराती है,आग लगे सारी दुनियां में ये तो बस कुर्सी चाहती है ... कहते हैं राजनीति और राजनेताओं में इंसानियत एवं सामाजिकता नही होती है। लेकिन डा.अशोक अग्रवाल ने इस मिथक को 2020 - 21 में आई कोरोना लहर में भी तोड़ दिया एक तरफ कोरोना के कारण बड़े बड़े लोगों सहित डाक्टर भी मौत के मुंह में जा रहे थे तब एक चाय वाले गरीब का मासूम बच्चा जिंदगी और मौत से जूझ रहा था परिजन उपचार के लिए इधर उधर दौड़ रहे थे अन्य हॉस्पिटल डाक्टरों ने भर्ती करने - देखने से इंकार कर दिया था यहां तक कि एक हॉस्पिटल ने बच्चे को मृत भी घोषित कर दिया तब सामाजिक संस्थाओं की पहल पर डॉ.अशोक अग्रवाल ने अपनी जिंदगी को दांव पर लगाकर बच्चे का उपचार किया और उसकी जिंदगी को बचाने में सफल रहे थे जिस पर सामाजिक संस्थाओं ने डा. अशोक का नागरिक अभिनंदन किया। ऐसे ही अनेक उदाहरण हैं जब किसी गरीब बच्चे के परिजनों पर फीस या दवा तक के पैसे नही थे तो बच्चों का निःशुल्क इलाज कर उन्हें अपनी तरफ से दवाएं भी दी गईं बल्कि स्टाफ द्वारा ली गई अनेक गरीब परिजनों की फीस भी वापस कर दी गई। यही कारण है कि डा. अशोक जब भी चुनाव लड़ते हैं तो उनको चाहने वाले लोग दल बल, जाति,धर्म से ऊपर उठकर व्यक्तिगत रूप से उन्हें बोट देते हैं हालांकि सपा बसपा पार्टी से मथुरा वृंदावन विधान सभा से कभी भी कोई प्रत्याशी जीत दर्ज नही कर सका है।
हर वर्ग के सुख - दुःख में लेते हैं भाग
जनपद का कोई भी राजनीतिक संगठन हो या जन प्रतिनिधि,नेता,कार्यकर्ता हो सबसे उनका व्यक्तिगत व्यवहार है सबके सुख दुःख में वह शामिल होते हैं यही स्थिति मुस्लिम हों जातीय संगठन हों या सामाजिक संस्था या फिर कोई क्लब हो सब धर्मों जातियों की जयंती,उत्सवों, कार्यक्रमों में वह तन मन,धन से सहयोग कर भाग लेते हैं यही कारण है कि वह अस्पताल पर कम समय दे पाते हैं और उनके डा. बेटे पूरे अस्पताल की व्यवस्था संभालते हैं उनकी पत्नी लता अग्रवाल भी अनेक सामाजिक संगठनों से जुड़कर सामाजिक कार्यों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेती हैं।
नोट: यह साक्षात्कार डा.अशोक अग्रवाल से व्यक्तिगत बातचीत पर आधारित है इसकी कॉपी करना या प्रशासित करना पूर्ण रूप से वर्जित है।



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