मुफ्त समान अनिवार्य शिक्षा एक दिवास्वप्न
News By :
विवेक दत्त मथुरिया
एक सुंदर और समृद्ध समाज की परिकल्पना तब तक अधूरी है, जब तक पूरा समाज शिक्षित न हों, उसके लिए आवश्यक है कि समान शिक्षा के नियम का अनिवार्य रूप से पालन किया जाए। मनुष्य के जीवन में शिक्षा उतनी ही जरूरी है जितना खाने को रोटी। किसी कवि ने कहा है कि :पढ़ना लिखना उतना जरूरी, जितनी चाहिए खाने को रोटी। आपने देखा होगा कि एक अनपढ़ और शिक्षित व्यक्ति के जीवन जीने के तौर तरीकों में कितना अंतर होता है।
बड़ा सवाल यह है कि समान मुफ्त अनिवार्य शिक्षा मौजूदा दौर में एक दिवास्वप्न से ज्यादा कुछ नहीं है। एक आदर्श लोकतंत्र की मजबूत बुनियाद समान मुफ्त अनिवार्य शिक्षा है। मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा लोककल्याणकारी राज्य की नैतिक जिम्मेदारी है। विडंबना यही है कि मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की जिम्मेदारी से व्यवस्था अपना पल्ला झाड़ चुकी है। शिक्षा का निजीकरण आम आदमी के लिए अभिशाप बन गया है। बेहतर शिक्षा के माध्यम से बच्चों के बेहतर भविष्य का सपना गरीबों की आंखों में जिंदा दफ़न होता जा रहा है। आजादी के बाद एक दौर हुआ करता था कि गरीब और अमीर का बच्चा एक साथ सरकारी स्कूल में पढ़ा करते थे। उस वक्त समाज में शिक्षक का जो सम्मान हुआ करता था, वह शायद किसी का हो। व्यवस्था का जैसे जैसे चरित्र बदला उसका असर शिक्षा व्यवस्था पर भी पड़ा।
शिक्षा के निजीकरण में शिक्षकों की भी स्थिति बहुत दयनीय है। निजीकरण के चलते निजी स्कूल पूरी तरह से शिक्षा मेफ़िया की भूमिका में नजर आ रहे हैं। निजी स्कूल संचालक पूरी तरह निरंकुश हैं। परम स्वतंत्र सिर पर न कोई वाली कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। पंडित जी, गुरु जी, मास्साब, शिक्षक, अध्यापक, टीचर और आज के सर।
यह सम्बोधन उस शख्स के लिए प्रयोग किया जाता है,जो क्लास में बच्चों को विभिन्न विषयों को सरलीकरण के साथ समझाते हुए उन्हें दक्ष करने का प्रयास करता है। सिखाने का कर्म ही इनका धर्म है, इसलिए इन्हें शिक्षक कहा जाता है।
शिक्षा ही वह चाबी है, जिससे बेहतर जीवन का बंद ताला खुलता है। शिक्षा रूपी चाबी के शिल्पी शिक्षक होता है।
इन्हें सरस्वती का साधक उपासक भी माना जाता था।
परिवर्तन की बयार ने जीवन की आर्थिक विसंगतियों से उपजी समस्याओं ने शिक्षक को लक्ष्मी का उपासक बना दिया है। जब तक शिक्षक अपने शैक्षिक धर्म का निर्वहन करते थे, तो समाज में इनका सबसे ज्यादा सम्मान भी था।
देश और समाज आहिस्ता आहिस्ता आर्थिक उदारीकरण की संस्कृति को ज्यों ज्यों स्वीकार करने लगा त्यों त्यों शिक्षकों के सम्मान में कमी होने लगी।
शिक्षा के निजीकरण ने तो इन्हें बधुआ शैक्षिक मजदूर बना कर रख दिया। निजी शिक्षण संस्थाओं में ठीक वही स्थिति नजर आने लगी जो ईंट भट्ठों पर मजदूरों की होती थी। अंग्रेजीजदा शिक्षा के लालच में अभिभावक इन निजी स्कूल संचालकों की मनमानी के आगे बेबस बने हैं।
बात सिर्फ अभिभावकों के शोषण की नहीं, शिक्षक भी जबरदस्त शोषण झेल रहे हैं। शिक्षा के निजीकरण ने उन्हें शिक्षक की बजाय शैक्षिक मजदूर बना दिया है।
निजी स्कूलों में शिक्षकों के वेतन को लेकर कोई नियम तय नहीं हैं। नियुक्ति पत्र में कुछ अंकित होता है औऱ हाथ में दिया कुछ जाता है। कारणवश छुरी कर ली तो उसका उस दिन का वेतन काट लिया जाता है। बेरोजगारी के माहौल में 'समझौता' ही एकमात्र विकल्प रह जाता है। नाना से काना भला। मरता क्या नहीं करता वाली स्थिति रह जाती है।
कभी कभी बाजार में निजी स्कूल का शिक्षक भूख लगने पर यह सोचता है कि खाने में सबसे सस्ता औऱ बेहतर क्या रहेगा? वहीँ दूसरी ओर सरकार से पगार पा रहे शिक्षक क्लास में बैठकर छुट्टियों का हिसाब किताब लगाते देखे जा सकते है।
सवाल इस बात का है कि शिक्षा को लेकर आखिर किस तरह की नीति देश मे होनी चाहिए?
सीधी बात है आर्थिक विषमता समाजिक विषमता को विस्तार देती है। यह बात शिक्षा पर भी लागू होती है। मुफ्त समान शिक्षा ही सामाजिक विषमता को कम करने में सहायक है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक सिलेबस की मुफ्त समान शिक्षा लागू हो। मंत्री और संतरी का बेटा एक साथ पढ़ेगा तो आरक्षण जैसे सवालो के वाजिब जवाब भी मिल जाएंगे। शिक्षक और अभिभावक भी तनाव मुक्त रहकर बच्चों के विकास में योगदान देंगे। पर अफसोस तो इस बात का है कि जनता धर्म जाति झगड़ो उलझी है, तब समान शिक्षा का सवाल मुंगेरी लाल के सपने से ज्यादा कुछ नहीं रह जाता।



Leave A Comment