लोकसभा चुनावः किस पार्टी का लहराएगा परचम!

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मथुरा। 2018 वर्ष के समापन के साथ ही वर्ष 2019 की सुनहरी सुबह अंगड़ाई ले रही है। इसके साथ ही राजनैतिक गलियारों में लोकसभा चुनाव की सरगर्मियां भी शुरु हो रही हैं। पार्टी चाहे जो भी हो कमोबेश सभी राजनैतिक पार्टियों के लिए योगेश्वर श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा की सीट काफी महत्वपूर्ण रहती है। हालांकि इन सबमें भाजपा के लिए धर्मनगरी की यह सीट यह काफी मायने रखती है। वर्तमान में भी यह सीट भाजपा के खाते में है और यहां भाजपा से सिने तारिका हेमा मालिनी सांसद हैं। इससे पहले वर्ष 2009 में यह सीट रालोद से लड़े जयंत चौधरी के पास थी लेकिन इस जीत में भी उनके साथ भाजपा के वोटर्स ही थे। इनके दम पर ही जयंत चौधरी जीत पाए थे।
कहावत है कि केंद्र की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर निकलता है। वर्ष 2014 में यह देखने को भी मिला जब भाजपा ने उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से 71 सीट पर कब्जा किया था। वहीं एनडीए के घटक दल अपना दल के उम्मीदवार दो सीटों पर विजयी रहे। भाजपा के लिए अयोध्या, काशी और मथुरा धार्मिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण रहीं हैं। वर्ष 2014 में मोदी लहर के चलते भाजपा उक्त तीनों ही सीटों पर अपना कब्जा करने में कामयाब रही थी। इनमें से मथुरा की सीट पर सिने तारिका हेमा मालिनी, काशी में स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सांसद हैं। अब वर्ष 2019 के शुरुआती महीनों में ही लोकसभा चुनाव होने हैं। भाजपा एक बार फिर वर्ष 2014 जैसा करिश्मा दोहराने को बेताब है लेकिन अब जहां धीरे-धीरे मोदी लहर की धार कुंद हो रही है। वहीं उनके विकास के वादों पर खरा न उतरना और किसान-बेरोजगारों की उम्मीदों का धराशायी होना उन पर काफी भारी पड़ सकता है। यही कारण है कि भाजपा हाईकमान को प्रदेश की लोकसभा सीटों पर विजय हासिल करने के लिए चुनावी रणनीति बनाते हुए काफी प्रयास करने होंगे। भाजपा से मथुरा सीट पर एक बार फिर वर्तमान सांसद हेमामालिनी के ही चुनाव लड़ने की पूरी संभावना है। हालांकि चौधरी तेजवीर सिंह एवं कैबिनेट मंत्री श्रीकांत शर्मा सहित अन्य कई वरिष्ठ और युवा नेता भी मैदान में ताल ठोकते नजर आ रहे हैं। सांसद हेमा मालिनी भी इन दिनों के जनपद के विकास कार्यां की अपेक्षा दिल्ली में भाजपा हाईकमान से अपनी दावेदारी को पुख्ता करने के प्रयास में जुटी हुई हैं। हालांकि इन सबमें प्रदेश सरकार प्रवक्ता और ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा का दावा फिलहाल मजबूत नजर आ रहा है।
वहीं सपा-बसपा-रालोद के गठबंधन की बात करें तो समाजवादी पार्टी के लिए मथुरा की लोकसभा सीट तो छोड़िए कभी विधानसभा सीट जीतना भी सिर्फ सपना ही रहा है। जब वर्ष 2007 में सपा ने विधानसभा चुनाव में बहुमत हासिल करते हुए सरकार बनाई थी उस समय भी मथुरा से उनका कोई विधायक नहीं चुना गया था। हालांकि बसपा के लिए एक समय में एक साथ यहां तीन विधायक रहे हैं। हालांकि रालोद से यहां एक बार वर्ष 2009 में जयंत चौधरी सांसद चुने गए थे लेकिन उस समय रालोद का भाजपा के साथ गठबंधन था। इस लिहाज से उक्त तीनों पार्टियों का पिछला ग्राफ देखें तो यह सीट रालोद के खाते में जाती दिख रही है लेकिन मतदाताआेंं का रुख जानें तो सिवा जयंत चौधरी के और कोई उम्मीदवार इस सीट पर भाजपा के उम्मीदवार को टक्कर देने की स्थिति में नजर नहीं आ रहा है। जबकि जयंत चौधरी के बागपत सीट से चुनाव लड़ने के कयास लगाए जा रहे हैं। रालोद कार्यकर्ता चाहते हैं कि जयंत चौधरी के न लड़ने की स्थिति में उनकी पत्नी चारु चौधरी मथुरा सीट से चुनाव लड़ें। उनका दर्द है कि मांट विधानसभा से चुनाव जीतने के बाद जयंत चौधरी अपने वादे से मुकर गए थे और जीती हुई सीट छोड़ दी थी इसके बाद उन्होंने कार्यकर्ताओं की आवाज को अनसुना करते हुए चारु चौधरी को भी चुनाव नहीं लड़ाया। इससे रालोद कार्यकर्ता काफी नाराज हैं। यदि जयंत और चारु दोनों ही अपनी दावेदारी से इंकार करते हैं तो वर्तमान में यहां से वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अशोक अग्रवाल रालोद से चुनाव लड़ने की मजबूत स्थिति में है। वह लगातार हाईकमान से संपर्क में हैं और स्थानीय मतदाताओं से भी जुड़ाव बनाए हुए हैं।
कांग्रेस अभी गठबंधन में शामिल पार्टियों के पत्ते खोलने का इंतजार कर रही है। हालांकि मथुरा में कांग्रेस का सुनहरी इतिहास रहा है। वर्ष 2004 में मथुरा से मानवेंद्र सिंह लोकसभा के सांसद रहे थे। जबकि उससे पहले वह दो बार सांसद रह चुके थे। वर्ष 2014 में कांग्रेस ने रालोद के साथ गठबंधन कर रालोद प्रत्याशी जयंत चौधरी के साथ चुनाव लड़ा था। हालांकि ड्रीम गर्ल हेमामालिनी के सामने यह गठबंधन नाकाफी साबित रहा और मोदी लहर एवं हेमामालिनी के ग्लैमर के सामने रालोद प्रत्याशी भारी भरकम मतों से हार गए। इस बार भी उम्मीद जताई जा रही है कि कांग्रेस सपा-बसपा- रालोद के साथ गठबंधन में शामिल होगी और रालोद के प्रत्याशी को ही समर्थन देगी। हालांकि यदि कांग्रेस एकला चलो की रणनीति पर चलते हुए अकेले लड़ने का फैसला करती है तो पूर्व सांसद मानवेंद्र सिंह के साथ अन्य वरिष्ठ और युवा नेता भी अपनी दावेदारी ठोकने के प्रयास में हैं।