चौमुहांः जहां ब्रह्माजी के साथ श्रीकृष्ण ने रची थी लीला

0
49

ये कुदरत की अजीब बिडबंना है कि जिसने बनाई हो सारी दुनिया आखिर उसकी ही न पूजा होती है और न ही उनके नाम के मंदिर हैं। इसे उनकी स्वयं की महिमा कहा जाए या फिर कुदरत की विडबंना। यह गाथा किसी और की नहीं बल्कि सृष्टि की रचना करने वाले स्वयं ब्रह्माजी की है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार, ब्रह्मा जी ने इस जगत की रचना की। धरती पर भगवान विष्णु और शिवजी के तो कई मंदिर हैं लेकिन ब्रह्मा जी के मंदिर अधिक नहीं हैं। जहां धरती के लोग उस रचनाकार की पूजा कर सकें। जिसकी वजह से इस दुनिया का अस्तित्व है। पुष्कर (राजस्थान) के बाद दूसरा मंदिर चैमुहां में है।

वेदों में विदित है कि सृष्टि रचियता स्वयं ब्रह्माजी एक बार आकाश मार्ग से अपने विमान द्वारा गुजर रहे थे। पृथ्वी लोक पर योगीराज भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अपने ग्वाल-बालों के साथ गायों व बछड़ों को चराने की बात विदित हुई। भगवान श्री कृष्ण ग्वाल-वालों के साथ जूठे भोजन को भी बडे़ चाव से ग्रहण कर रहे हैं। इस भाव भरे दृश्य से ब्रह्मा जी को संदेह उत्पन्न हुआ। उनके मन में विचार आया कि साधारण बालक जो ग्वाल-बालों के साथ गायें चरा रहा है और जूठा-सूचा खाना भी खा रहा है। भला ये अवतारी कैसे हो सकता है। ब्रह्माजी ने उसी क्षण विमान को रोकने का संकेत दिया और भगवान श्री कृष्ण की परीक्षा लेने की ठान ली। ब्रह्माजी विमान से नीचे उतरे और वहां अपनी माया से मैदान में चर रही गायों व बछड़ों सहित ग्वाल-बालों को एक गुफा में छिपा दिया। इधर भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी मायावी शक्ति का प्रयोग किया तो ब्रह्माजी द्वारा रची गई लीला प्रभु पलक झपकते ही समझ गये। भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी मायावी शक्ति से उतनी ही संख्या में और उसी आकार प्रकार के ग्वाल-बाल, गायें व बछड़ों को तैयार कर दिया और नंदगांव की ओर चल दिए।

ब्रह्मा जी ने समझा कि ये बालक नजर बचाकर हमारे द्वारा छिपाई गई गाय, बछड़ों और ग्वाल बालों को गुफा से निकाल कर ले आया है। ब्रह्मा जी ने आनन-फानन में गुफा देखी तो वहां वही दृश्य था जो बाहर का था। इस बार भी ब्रह्माजी चकरा गये और सोचा कि शायद बालक मेरे डर की वजह से पुनः इसी गुफा में ग्वाल-बालों व गाय बछड़ों यहां गुफा में छोड़ गया है। चलो देखते हैं कि ये बालक बाहर अब क्या कर रहा है। बाहर आते ही फिर वही ग्वाल-वाल व गाय बछड़ों का दृश्य था। ब्रह्मा जी कभी गुफा देखते तो कभी मैदान की तरफ लेकिन उनकी ग्वाल-बाल व गाय, बछड़े वही नजर आने लगे। तभी ब्रह्माजी समझ गये कि ये बालक नहीं वरन स्वयं अवतारी भगवान है। ब्रह्माजी का भ्रम तो दूर हुआ ही, साथ ही साथ अहम भी चकनाचूर हो गया। अंततः ब्रह्माजी ने भगवान श्री कृष्ण से क्षमा याचना मांगी। तो भगवान उन पर प्रसन्न हो गये और उनसे वरदान मांगने को कहा। ब्रह्माजी ने अपनी इच्छा जाहिर करते हुए वरदान मांगा कि प्रभू मेरी तपस्या इसी झाड़ी में पूर्ण हो, इस पर भगवान श्री कृष्ण ने तथास्तु कहा। ब्रह्माजी इसी स्थान पर बनी झाड़ियों के बीच तपस्या में लीन हो गए। सैकड़ों वर्षों के बाद एक पुजारी को इसी झाड़ी में ब्रह्माजी की मूर्ती होने का स्वप्न दिया तो झाड़ी को खुदवाया गया। तब यहां ब्रह्मा जी की एक प्राचीन मूर्ति निकली। जिसे इसी स्थान पर स्थापित करवाया गया।

तो इसलिए नहीं होती ब्रह्माजी की पूजा

ब्रह्माजी की पूजा न होने के पीछे पौराणिक गाथाओं के अनुसार, एक बार ब्रह्माजी और विष्णुजी में एक दूसरे से बडे़ होने की बहस छिड़ी हुई थी। इस विवाद के निर्णय के लिए ब्रह्मा और विष्णु दोनों भगवान शिवजी के पास पहुंचे। ब्रह्मा और विष्णु ने अपनी लड़ाई की बात बताकर जल्द निर्णय करने की बात कही। भगवान शिव ने इस संदेह को दूर करने के लिए अपने शरीर का आकार विशाल कर लिया। शिव ने ब्रह्माजी को पैरों की ओर नीचे पाताल में और भगवान विष्णु को सिर की ओर आकाश में थाह लेने अथवा दूरी मापने के लिए भेजा और शर्त रखी कि जो इस काम को जल्दी करेगा वो ही दोनों में श्रेष्ठ कहलाएगा। काफी देर बाद भगवान विष्णु आए और माफी मांगते हुए बोले कि प्रभु मैं आपके सिर की दूरी तय नहीं कर सका और न ही मुझे आपके सिर की कोई थाह मिली है। इधर ब्रह्मा जी ने भगवान शिव से झूठ का सहारा लेते हुए कहा कि हे प्रभु, काफी गहराई में जाकर पानी-पानी है। पानी में बहुत अंदर जाकर पाताल में आपके पैरों की थाह मिली है। इसी झूठ बोलने पर भगवान शिव ने ब्रह्माजी को श्राप दे दिया और कहा कि जाओ तुम्हारी कलयुग में न तो कोई पूजा करेगा और न ही तुम्हारे मंदिर होंगे। आज समूचे विश्व में ब्रह्माजी का प्राचीन मंदिर राजस्थान के पुष्कर और दूसरा मंदिर जनपद मथुरा के कस्बा चौमुहां में है। यहीं पर चंद्र सरोवर है। जहां चंद्रदेव ने स्नान कर श्राप से मुक्ति पाई थी। तभी से यह चंद्र सरोवर के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि इस सरोवर में स्नान करने से इंसान सभी रोगों से मुक्त हो जाता है। ब्रह्माजी के चार मुंह होने के कारण पहले यहां बसे गांव का नाम चैमुख था, फिर चौमुह हुआ। अब कालातंर में नाम बदलकर वर्तमान समय में कस्बे को चौमुहां के नाम से जाना जाता है।

 

1960 के दशक में चौमुहां में स्थापित हुआ मंदिर

स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, वर्ष 1960 के दशक में नमोनारयण बाबा को ब्रह्माजी ने स्वप्न में दर्शन देकर अपनी मूर्ति स्थापित कर मंदिर बनाने की बात कही। बाबा ने झाड़ियों से निकाल कर मूर्ति की इस स्थान पर स्थापना कराई। बताया जाता है कि अंत में नमोनारायण बाबा ने 24 गांवो के लोगों के सामने जीवित ही मंदिर स्थल पर ही समाधि ले ली। जहां आज तक उनका समाधि स्थल बना हुआ है। उनके बाद कई साधु संतों ने ब्रह्मवन में आकर ब्रह्माजी की आराधना की। अब करीब बीस सालों से महंत राजाराम बाबा ब्रह्मा जी की सेवा में लगे है। उनका कहना है कि ब्रह्माजी की मूर्ति आज भी सिद्ध और चमत्कारी है। यहां जो भी इच्छा लेकर भक्त आता है। उसकी इच्छा निश्चय ही पूर्ण होती है। मंदिर के पास करीब बाईस बीघा जमींन है। उसमें से कुछ उपजाऊ जमीन का हिस्सा दबंगों के कब्जे में है। जो कि लगातार शासन से शिकायत के बावजूद भी आज तक कब्जा मुक्त नहीं हो पाई है।

पौराणिक महत्व होने के बाद भी यहां प्रशासन ने न तो लाईट की कोई उचित व्यवस्था कराई है और न ही मंदिर तक जाने के लिए सड़क है। पास ही में बना ब्रह्म कुंड भी अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है। इस मंदिर की ओर नेता, शासन, प्रशासन एवं समाजसेवी संगठनों के अलावा नगर पंचायत ने भी कोई ध्यान नहीं दिया है। जबकि समूचे विश्व में ब्रह्मा जी का यह सिर्फ दूसरा ही मंदिर है और यह मंदिर श्रीकृष्ण की गाथाओं से भी जुड़ा हुआ है। फिर भी इस मंदिर की ओर अब तक किसी का ध्यान नहीं गया है। यदि शासन-प्रशासन इस मंदिर की ओर ध्यान देते तो संभवतः यह मंदिर देश विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए श्रद्धा और आस्था का मुख्य आकर्षक केंद्र हो सकता था।