बसपा ने मिलाया भाजपा से हाथ, सपा से करेगी दो-दो हाथ

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लखनऊ। बसपा के 6 विधायकों के पाला बदलकर सपा का दामन थामने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री मायावती सकते में आ गई हैं। उन्होंने गठबंधन के पूर्व सहयोगी अखिलेश यादव पर हमला बोला। साथ ही सपा को हराने के लिए जरूरत पड़ने पर भाजपा का साथ देने की भी बात कही।

लोकसभा चुनाव 2019 में बसपा और सपा के साथ-साथ चुनाव लड़ने की घोषणा होते ही सियासी पंडित भी आश्चर्य चकित हो गए थे। इसका कारण लखनऊ का गेस्ट हाउस कांड था। इस कांड के बाद कोई भी यह नहीं सोच सकता था कि बसपा और सपा कभी एक साथ आकर चुनाव लड़ेंगी। इसके कारण ही जब दोनों ने एक साथ चुनाव लड़ने का ऐलान किया तो लोगों का चैंकना स्वाभाविक था। लेकिन लोकसभा चुनाव खत्म होने के साथ ही दोनों पार्टियों के बीच कटुता बढ़ने लगी। मायावती ने सपा पर लगातार आरोप लगाने शुरू कर दिए। फिर अचानक ही गठबंधन तोड़ने का निर्णय लेकर एक बार फिर लोगों को चैंकाया।

अब राज्य सभा चुनाव से पूर्व राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों की घोषणा होने के साथ ही एक बार फिर प्रदेश में सियासी भूचाल सा आ गया है। मायावती की पार्टी के छह विधायकों ने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया। इससे गुस्साई मायावती ने पत्रकार वार्ता का आयोजन कर सपा पर आरोप लगाए। कहा कि सपा से गठबंधन की भलाई के लिए 1995 के गेस्ट हाउस कांड का केस वापस लेना उनकी भूल थी। उनके इस बयान को यूपी में नौ नवंबर के राज्यसभा चुनाव में पार्टी को लगे झटके से जोड़कर देखा जा रहा है।

मायावती ने कहा कि यूपी के विधान परिषद चुनाव में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी को हराने के लिए जरूरी हुआ तो भाजपा के पक्ष में भी वोट करेंगी। गौरतलब है कि बसपा के सात विधायकों ने बगावत कर अखिलेश यादव से मुलाकात की थी। राज्यसभा चुनाव में बसपा उम्मीदवार के प्रस्तावक बने दस विधायकों में भी पांच ने अपना प्रस्ताव वापस ले लिया था। मायावती ने कहा कि हमें सपा से हाथ नहीं मिलाना चाहिए था। हमें इस बारे गहराई से सोचना चाहिए था, लेकिन हमने जल्दबाजी में निर्णय लिया। बसपा सुप्रीमो ने यह भी कहा कि हमने लोकसभा चुनाव में गठबंधन के लिए कड़ी मेहनत की, लेकिन अखिलेश पहले ही दिन से सतीश मिश्र से कहते रहे कि दोनों दलों ने हाथ मिला लिया है, लिहाजा केस वापस लिया जाना चाहिए। आरोप लगाया कि सपा में पारिवारिक फूट के कारण गठबंधन का उन्हें ज्यादा लाभ नहीं मिला। चुनाव बाद उनकी बेरुखी के कारण हमने नाता तोड़ लिया।

पांच विधायकों ने प्रस्तावक से नाम वापस लिया
राज्यसभा चुनाव में बसपा उम्मीदवार के प्रस्ताव बने विधायकों में से एक विधायक ने तो प्रस्ताव पर फर्जी हस्ताक्षर होने का दावा भी किया था। बागी विधायकों का कहना था कि पार्टी में उनकी अनदेखी हो रही थी और बीजेपी से मिलीभगत की तैयारी थी। वहीं बसपा का आरोप है कि सपा विधायकों की खरीद-फरोख्त कर रही है। बसपा के प्रयागराज की हांडिया सीट से विधायक हाकिम लाल बिंद का कहना है कि उनका फर्जी हस्ताक्षर करके पर्चा दाखिल किया गया था। दूसरा उनका इल्जाम है कि पार्टी कोआर्डिनेटर उनसे कोई संपर्क नहीं रखते, किसी बैठक में नहीं बुलाते। पार्टी के कुछ विधायक कहते हैं कि उन्हें अहसास हो गया है कि मायावती बीजेपी के साथ मिल गई हैं। इसलिए उन्होंने प्रस्ताव के बाद भी अपना नाम वापस लेने की चिट्ठी दे दी।

राज्यसभा सीट जीतने के लिए यह है गणित
यूपी में राज्यसभा की दस सीटों के लिए चुनाव होने हैं। एक सीट जीतने के लिए 37 वोटों की दरकार है। बीजेपी के पास 304 विधायक और 16 समर्थकों के वोट हैं यानी 320। बीजेपी के आठ उम्मीदवारों को जीतने के लिए 296 वोट चाहिए। इसके बाद उसके पास 24 वोट बचते हैं। भाजपा 13 वोटों का इंतजाम कर अपना नौवां उम्मीदवार भी जिता सकती थी, लेकिन कहा जा रहा है कि उसने अपने ये वोट बीएसपी को देने का वादा किया है। बीएसपी के पास सिर्फ 18 वोट हैं, जिसमें से मुख्तार अंसारी जेल में है और दो एमएलए पहले से बागी हैं। लिहाजा 15 वोट रखने वाली बीएसपी ने चुनाव में प्रत्याशी उतार दिया है। भाजपा के वोटों के जरिये उनकी जीत पक्की हो जाती।