महंत बालमुकुंद का रहा है विवादों से चोली दामन का साथ

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मथुरा। एक महत्वाकांक्षी युवक की आश्रम कब्जाने और स्वयं महंत बनने की महत्वकांक्षा का शिकार हुए वृंदावन के महंत बालमुकुंद शरण शास्त्री का विवादों से चोली-दामन का साथ रहा है। महंत बालमुकुंद भी काफी महत्वाकांक्षी बताया जा रहा है। महंत ने वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में मथुरा से लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी भी की थी। वह भाजपा से टिकट चाह रहा था लेकिन काफी भागदौड़ के बाद भी उसे टिकट नहीं मिल सकी थी। महंत ने डस्टर कार भी अपने मित्र से हथिया ली थी। महंत को काफी दबंग प्रवृत्ति का माना जाता था। इसके शरीर पर दो गोलियों के निशान भी मिले हैं।

गोपाल बाग आश्रम

महंत बालमुकुंद शरण शास्त्री पुत्र द्वारिका प्रसाद निवासी गांव बसई थाना बिसौली जिला बदायूं काफी समय पूर्व ही वृंदावन के अटल्ला चुंगी स्थित निम्बार्क पीठ गोपाल आश्रम में महंत बन गया था। महंत खुद काफी महत्वकांक्षी था और दबंग प्रवृत्ति का था। वह लगातार विवादों में बना रहता था। साथ ही राजनेताओं के रुतबे को देखते हुए वह स्वयं भी सांसद बन राजनेता बनने के ख्वाब देख रहा था। इसके लिए उसने वर्ष 2014 में लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए काफी भागदौड़ की थी। वह भाजपा से लोकसभा चुनाव की टिकट मांग रहा था लेकिन अंत में वह सफल नहीं हो सका। उसने चुनावी टिकट के लिए होने वाली भागदौड़ करने के लिए अपने एक मित्र से उसकी नई डस्टर कार कुछ दिन के लिए ले ली थी लेकिन बाद में महंत की नीयत में खोट आ गया और उसने कार वापस नहीं की। जब मित्र ने दबाव बनाया तो महंत ने कार को खरीदने की कहते हुए कार का सौदा 9.80 लाख रुपए में कर लिया, लेकिन कार के पैसे नहीं दिए। जब फिर से दबाव बनाया गया तो उसने धीरे-धीरे करके 4 लाख रुपए तो दे दिए लेकिन 5.80 लाख रुपए नहीं दिए। इस पर कार मालिक मित्र ने कोर्ट की शरण ली थी और यह मुकदमा आज भी न्यायालय में विचाराधीन है। महंत के भतीजे अंकित ने महंत बालमुकुंद शरण शास्त्री के चुनाव लड़ने के लिए प्रयास करने की पुष्टि की है। उसने बताया कि महंत के नाम पर बदायूं स्थित गांव में करीब 12 बीघा पैतृक जमीन थी। इस जमीन पर वह कालेज खोलना चाहता था लेकिन यह इच्छा अधूरी रह गई।
आश्रम के नाम पर करोड़ों रुपए की एफडी थीं। यह एफडी आश्रम के ट्रस्टियों में शामिल एक अधिवक्ता के पास रखी हुई थीं। महंत इन एफडी को अधिवक्ता से मांग रहा था लेकिन वकील देने को तैयार नहीं था। इसे लेकर दोनों में काफी खींचतान मची हुई थी। एफडी की कीमत करोड़ों में होने के कारण विवाद लगातार बढ़ रहा था लेकिन महंत अपने जीते जी इन एफडी को अपने कब्जे में नहीं ले सका था।
महंत बालमुकुंद शरण शास्त्री ने वर्ष 2012 में छाता क्षेत्र में मर्डर के कुछ आरोपियों को सजा से बचाने के लिए 3 लाख रुपए का सौदा किया था। यह रुपए लेकर भी महंत ने अपनी तरफ से कोई प्रयास नहीं किया तो आरोपियों के परिजनों ने पैसे मांगना शुरु कर दिया। महंत के टालने पर गुस्साए परिजन सैकड़ों की संख्या में आश्रम पर पहुंच गए थे और महंत के साथ मारपीट भी कर दी थी। इससे घबराकर महंत ने 50 हजार रुपए काटकर 2.50 लाख रुपए वापस कर दिए थे। इसके बाद ही यह मामला शांत हो सका था।
हत्या का आरोपी उमेश पाठक महंत बालमुकुंद शरण शास्त्री के पास आने से पहले हरे राम-हरे कृष्ण आश्रम स्थित बाबा नवलदास के पास अपनी मुहंबोली विकलांग बहन के साथ रहता था। वहां बाबा और उनके समर्थक उमेश पाठक की हरकतों के चलते काफी परेशान थे। जब बाबा ने इसका विरोध किया तो उमेश पाठक ने बाबा और आश्रम में मौजूद महिलाओं के साथ अभद्रता कर दी थी। इसके बाद नवलदास और उसकी बहन आश्रम से भाग कर महंत बालमुकुंद के आश्रम में आकर छुप गए थे। बाबा नवलदास के परिजन और समर्थक उमेश पाठक की अभद्रता से परेशान होकर महंत बालमुकुंद के आश्रम पर पहुंच गए। यहां महंत ने विरोध किया तो बाबा नवलदास के परिजनों और समर्थकों ने महंत को ही पीट दिया था। इस पर उमेश पाठक ने महंत से कहा था कि वह आपके साथ मारपीट का बदला बाबा नवलदास से अवश्य लेगा। इसके बाद ही उमेश पाठक की विकलांग बहन ने बाबा नवलदास पर बलात्कार का आरोप लगाया था और बाबा नवलदास जेल चले गए थे।
बाबा नवलदास के जेल जाने के बाद उनके परिजनों ने महंत बालमुकुंद शरण शास्त्री को चेताया था कि वह उमेश पाठक से सतर्क रहे। उमेश पाठक किसी भी हद तक जा सकता है लेकिन बाबा नवलदास के जेल चले जाने के चलते महंत उमेश पाठक से काफी प्रभावित था और उस पर आंख बंद कर भरोसा करता था। इसी भरोसे के चलते महंत बालमुकुंद शरण शास्त्री उमेश के साथ कहीं भी चला जाता था और उमेश पाठक ने इसी विश्वास का फायदा उठाते हुए महंत को अपना शिकार बना लिया।
भतीजे अंकित शंखधार ने बताया कि आश्रम पर कब्जा करने के इरादे से कुछ साल पूर्व कुछ लोगों ने धावा बोल दिया था। इस दौरान काफी संख्या में लोग आश्रम पर कब्जा करने पहुंच गए थे। इससे दोनों पक्षों में जमकर गोलियां चली थीं। इसमें महंत बालमुकुंद के हाथ में गोली लगी थी। वहीं आश्रम में ही अचानक चली गोली उनकी जांघ में लग गई थी। दोनों गोलियों के निशान से ही महंत बालमुकुंद शरण शास्त्री की शिनाख्त हो सकी।
हालांकि महंत के भतीजे अंकित शंखधार ने बताया कि अन्य आरोपों को नकार दिया है। उनका कहना है कि वह किसी भी तरह के विवादों में शामिल नहीं थे।