लोकसभा चुनावः हमें तो अपनों ने लूटा, गैरों में कहां दम था……..

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मथुरा। हमें तो अपनों ने लूटा, गैरों में कहां दम था, हमारी कश्ती ही वहां डूबा, जहां पानी कम था। यह पंक्तियां मथुरा में महागठबंधन प्रत्याशी कुंवर नरेंद्र सिंह एवं कांग्रेस के प्रत्याशी महेश पाठक पर एकदम सटीक बैठती हैं। यहां गैरों ने ही नहीं वरन् अपनों ने भी दोनों ही प्रत्याशियों से मुंह मोड़कर इन्हें आईना दिखा दिया कि हम तुम्हारे साथ नहीं हैं।


लोकसभा चुनाव 2019 में मथुरा जनपद में भाजपा ने सिने स्टार एवं सिटिंग सांसद हेमामालिनी को, महागठबंधन से रालोद के खाते में आई सीट पर कुंवर नरेंद्र सिंह और कांग्रेस ने उद्योगपति महेश पाठक को अपना प्रत्याशी बनाया। इसमें भाजपा प्रत्याशी हेमामालिनी को जहां अपने द्वारा कराए विकास कार्यां और मोदी के नाम पर जीत का भरोसा था तो वहीं कुंवर नरेंद्र सिंह अपनी बिरादरी के ठाकुर वोट, रालोद के बेस जाट वोट, सपा के नाम पर यादव-मुस्लिम वोट एवं बसपा के नाम पर दलित वोट के दम पर जीत की उम्मीद लगा रहे थे। तो कांग्रेस भी अपने परंपरागत वोटर्स के साथ ब्राहमण, मुस्लिम और वैश्य समाज के वोट के दम पर मुकाबले को त्रिकोणिय बनाने की पूरी कोशिश में थी। लेकिन मतगणना के दिन भाजपा प्रत्याशी की उम्मीदों के अलावा सभी अन्य प्रत्याशियों का भरोसा धूल धूसरित हो गया। कुंवर नरेंद्र सिंह को जहां सिर्फ दलित, यादव एवं मुस्लिम वोट ही मिल सके। यह हम नहीं वरन् नरेंद्र सिंह को मिले वोटों की संख्या बता रही है। उन्हें कुल 3,76,399 वोट मिले हैं।

जबकि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में रालोद के जयंत चौधरी को करीब 2.40 लाख, बसपा के योगेश द्विवेदी को लगभग 1.75 लाख मिले थे। सपा के प्रत्याशी चंदन सिंह को लगभग 36 हजार वोट मिले थे। इस तरह 2014 में रालोद, बसपा और सपा को मिले वोट बैंक के हिसाब से ही इस बार कुंवर नरेंद्र सिंह को काफी कम वोट मिले हैं क्योंकि वर्ष 2014 में रालोद, बसपा और सपा को कुल लगभग 4,51,000 वोट मिले थे। वहीं इस बार कुल 3,76,399 वोट ही मिले हैं। वहीं कांग्रेस प्रत्याशी महेश पाठक को सिर्फ 27925 वोट ही मिले हैं। वोटों की संख्या के आधार पर माना जा रहा है कि कांग्रेस को सिर्फ उसका परंपरागत वोट ही मिल सका है। उन्हें चतुर्वेद समाज के मतदाताओं का समर्थन नहीं मिल सका। आंकड़ों की मानें तो जनपद में लगभग 18000 चतुर्वेद समाज का मतदाता है। यदि चतुर्वेद समाज का पूरा समर्थन और कांग्रेस के परंपरागत वोटर्स कांग्रेस प्रत्याशी को मिलते तो वोटों की संख्या काफी अधिक होती।