उच्च शिक्षाः युवाओं की कब्रगाह न बन जाए मथुरा

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मथुरा। शिक्षा हब के रुप के चर्चित हो चुका मथुरा धीरे-धीरे युवा छात्र-छात्राओं की कब्रगाह बनता जा रहा है। शिक्षण संस्थानों के उत्पीड़न का प्रभाव है अथवा पढ़ाई का भारी बोझ। युवा विद्यार्थी लगातार अपनी जान से हाथ धो रहे हैं। ऐसा ही एक ताजा मामला नेशनल हाईवे स्थित केडी मेडिकल कालेज में एमबीबीएस की छात्रा का शव रहस्यमय परिस्थतियों में मिलने से सामने आया है। वहीं इससे पहले भी जनपद के प्रसिद्ध शिक्षण संस्थानों में युवाओं के शव फांसी के फंदे पर लटके मिले हैं। प्रत्येक मामले में परिजनों ने शिक्षण संस्थानों पर उत्पीड़न और मानसिक रुप से परेशान करने के आरोप लगाए लेकिन बाद में सभी परिजन दबाव में पीछे हट गए अथवा पुलिस प्रशासन द्वारा मामले दबा दिए गए।


केस नंबर 1- केडी डेंटल कालेज में 28 जून 2018 को बीडीएस फर्स्ट ईयर की छात्रा अनुष्का कश्यप पुत्री राकेश कुमार कश्यप निवासी कमला नगर आगरा का शव कालेज के हॉस्टल में पंखे से लटका मिला था। दुपट्टे का फंदा बनाकर फांसी लगाई गई थी। छात्रा के पास कोई सुसाइड नोट नहीं मिला था लेकिन पुलिस और कालेज प्रबंधन ने इसे आत्महत्या का ही मामला बताया था। जबकि परिजनों ने कालेज प्रबंधन पर उत्पीड़न का आरोप लगाया था। इसके बाद भी इस मामले में कोई कार्यवाही आगे नहीं बढ़ सकी।

केस नंबर 2- जीएलए विश्वविद्यालय में इसी वर्ष 15 जनवरी को आरती पुत्री तेजवीर निवासी सैनिक कालोनी देवरी रोड आगरा ने हॉस्टल में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। उसके पास सुसाइड नोट मिला था। इस मामले में भी परिजनों ने कालेज प्रबंधन पर उसे परेशान करने का आरोप लगाया था लेकिन यह मामला भी दबा दिया गया। आरती एमबीए द्वितीय वर्ष की छात्रा थी।

जीएलए यूनिवर्सिटी के एक और छात्र ने फिर चूमा फांसी का फंदा

केस नंबर 3- जीएलए विश्वविद्यालय में 26 जनवरी 2019 को बीटेक के छात्र गगन अग्रवाल पुत्र देवेंद्र अग्रवाल निवासी अलीगढ़ कालेज हॉस्टल में संदिग्ध परिस्थतियों में फांसी के फंदे पर झूलता हुआ मिला था। पिता देवेंद्र अग्रवाल ने इस मामले में वृंदावन कोतवाली में अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ पुत्र गगन अग्रवाल की हत्या करने की तहरीर देते हुए मामले की जांच करने का अनुरोध किया था लेकिन कालेज प्रबंधन के साथ पुलिस और प्रशासनिक मशीनरी के गठजोड़ होने के चलते मुकदमा ही दर्ज नहीं किया गया था। इसके बाद उन्होंने काफी प्रयास किया और पुलिस अधिकारियों के चक्कर लगाए लेकिन कुछ हाथ नहीं लग सका। देवेंद्र अग्रवाल का बड़ा बेटा प्रणव अग्रवाल भी जीएलए विवि में पढ़ रहा है। गगन की मौत से आहत पिता देवेंद्र ने प्रणव को विवि से निकाल कर किसी अन्य कालेज में प्रवेश दिलाने का भी प्रयास किया, लेकिन उन्हें एनओसी नहीं दी गई। इस तरह यह मामला भी आगे नहीं बढ़ सका।  ऐसे भी कई मामले सामने आए। जब अभिभावकों को सामाजिक प्रतिष्ठा का हौव्वा दिखाकर अथवा उन पर दबाव बनाकर बिना कार्यवाही के ही बच्चों का शव ले जाने पर मजबूर किया गया। इससे उन विद्यार्थियों के शव का पोस्टमार्टम भी नहीं हुआ और यह मामले सामने भी नहीं आ सके।
युवाओं के रहस्यमय तरीके से मरने अथवा आत्महत्या करने के मामले जिस तेजी से सामने आ रहे हैं। क्या पुलिस अधिकारी इस तिलिस्म को तोड़ने में सफल हो सकेंगे कि इस तरह की घटनाएं क्यों हो रही हैं। अथवा पुलिस अधिकारी भी कालेज प्रबंधन के दबाव के आगे नतमस्तक रहेंगे।