आसान नहीं है हेमामालिनी का दूसरी बार लोकसभा में पहुंचना !

0
1046

मथुरा। काफी कशमकश के बाद आखिरकार भाजपा की स्टार प्रचारक सिने तारिका हेमामालिनी के मथुरा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने की अधिकृत घोषणा हो ही गई। हेमामालिनी ने वर्ष 2014 में रिकार्ड मतों से जीत हासिल कर रालोद के जयंत चैधरी को पटखनी दी थी। वर्ष 2014 में मोदी की लहर और हेमामालिनी के स्टारडम के चलते यह जीत काफी आसान रही थी। जबकि इस बार सिटिंग सांसद हेमामालिनी की जीत की डगर कठिन दिखाई दे रही है।
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में पीएम नरेंद्र मोदी की लहर और हेमामालिनी के ग्लैमर का जादू मथुरा के लोगों के सिर चढ़कर बोला था। इसके चलते हेमामालिनी ने रालोद के जयंत चैधरी को 3,30,743 मतों से हराकर मथुरा सीट पर अब तक सबसे बड़ी जीत हासिल की थी। इस बार स्थिति वर्ष 2014 से काफी अलग दिखाई दे रही है। स्थानीय मतदाताओं की मानें तो इस बार हेमामालिनी को जीतने के लिए काफी प्रयास करने होंगे। हालांकि कुछ परिस्थितियां इस बार उनके पक्ष में भी हैं लेकिन कुछ कारण ऐसे भी हैं जो कि हेमामालिनी की जीत की डगर में रोड़ा अटका सकते हैं। मथुरा लोकसभा सीट पर ग्रामीण इलाकों में सांसद हेमामालिनी के साथ साथ भाजपा के प्रति नाराजगी है। हेमामालिनी ने वर्ष 2014 में जिन मुद्दों को लेकर चुनाव लड़ा था उनमें से अधिकांश समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई हैं। इन समस्याओं का निराकरण न होना भी ड्रीमगर्ल के खिलाफ जा सकता है। मथुरा में खारा पानी की समस्या, खस्ताहाल सड़कें, यमुना प्रदूषण का बरकरार रहना, सांसद द्वारा गोद लिए गांवों में मूलभूत समस्याओं का निराकरण न होना, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार की कोई व्यवस्था न होना आदि समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। स्थानीय भाजपा मंे गुटबंदी हावी हो चुकी है। मथुरा वृंदावन नगर निगम के करीब 15 से अधिक पार्षद वरिष्ठ भाजपा नेताओं की कार्यशैली के विरोध में हैं। 5 साल के पूरे कार्यकाल में उनके पास एक भी ऐसी उपलब्धि नहीं है जिसे बताकर वह वोट मांग सकें। यहां तक कि जाट और ठाकुर मतदाता भी इस बार उनसे नाराज दिखाई दे रहे हैं। भाजपा को वोट देने वाले ठाकुर कमल सिंह भी इस बदलाव को स्वीकार करते हैं। मथुरा लोकसभा सीट पर जाट मतदाताओं का रुझान महत्वपूर्ण माना जाता है। गत लोकसभा चुनाव में जाट भाजपा के पक्ष में दिखाई दिए थे जबकि इस बार यह मतदाता भाजपा से रुठे हुए दिख रहे हैं वहीं रालोद के प्रति उनमें सहानुभूति देखी जा रही है। वहीं इस बार सपा, बसपा और रालोद के गठबंधन के चलते जाट और दलित मतदाताओं का धुव्रीकरण भाजपा पर भारी पड़ सकता हैं सपा, बसपा, रालोद गठबंधन ने कुंवर नरेंद्र सिंह को प्रत्याशी बनाया है। इससे ठाकुर भी गठबंधन प्रत्याशी के पक्ष में खड़े दिख सकते हैं। वहीं स्थानीय बनाम बाहरी मुद्दा चला तो भाजपा प्रत्याशी हेमामालिनी को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि कुछ परिस्थितियां अभी भी हेमामालिनी के पक्ष में हैं। इनमें प्रमुख रुप से पाकिस्तान में एयर स्ट्राइक के बाद एक बार फिर मोदी लहर, पीएम मोदी की योजनाएं, मथुरा जंक्शन रेलवे स्टेशन पर हुए विकास कार्य, हेमामालिनी का स्टारडम और जातिगत समीकरणों को साधने से चुनाव परिणाम उनके पक्ष में भी जा सकता है।