सफेद हाथी साबित हो रहा वेटरिनरी कॉलेज का माधुरीकुण्ड फॉर्म

0
243

दिलीप कुमार यादव
मथुरा। वेटरिनरी कॉलेज को विश्वविद्यालय बनने के बाद से 1396 एकड़ के माधुरीकुण्ड फॉर्म के हालात बद से बदतर हुए हैं। किसी जमाने में सांड़ों के संरक्षण से लेकर चार कुंतल तक दुग्ध उत्पादन वाले इस फॉर्म पर शासन की स्वीकृति के बाद भी स्थाई तौर पर प्रभारी की नियुक्ति तक नहीं हुई है। इतना ही नहीं पूरे फॉर्म में से करीब 700 एकड़ फॉर्म पर ही खेती हो रही है। विवि बीज उत्पादन का काम करता है लेकिन जनपद के किसी किसान को एक दाना बीज यहां से नहीं मिलता। वेटरिनरी कॉलेज 2001 में पंडित दीन दयाल उपाध्याय पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय एवं गौ अनुसंधान संस्थान के रूप में अस्तित्व में आया। अड़ींग के निकट इस विवि का माधुरीकुण्ड प्रक्षेत्र कभी गुलजार रहा करता था लेकिन कई सालों से यहां के हाल बेहाल चल रहे हैं।
पूर्व कुलपति ऐपी सिंह ने फॉर्म के हालात सुधारने को थोड़ी कवायद की लेकिन वह भी कर्मचारियों की वजह से परवान नहीं चढ़ सकी। विवि में दर्जनों आचार्यों आदि की नियुक्ति एवं पदोन्नति की गईं लेकिन 6 वर्ष पूर्व शासन से स्वीकृति प्राप्त होने के बाद भी फॉर्म प्रभारी की नियुक्ति नहीं की गई है। विवि की स्थापना से पूर्व यह फॉर्म पशुपालन विभाग के अधीन रहा। इस दौरान यहां कई नस्लों के सांडों का संरक्षण कर अन्य केन्द्रों को भेजा जाता था। यहां का दुग्ध उत्पादन भी उस दौर में 4 कुंतल प्रतिदिन तक होता था। इतना ही नहीं जमीन पर खेती भी करीब 900 एकड़ में होती थी। सीएसए विवि कानपुर के अधीन रहने के दौरान भी यहां काम दिखता था। इतना बड़ा फॉर्म स्थानीय किसानों के लिए मॉडल बनने की बजाय सफेद हाथी साबित हो रहा है।

एग्रीकल्चर कॉलेज बनने से बदल सकते हैं हालात
ब्रज अकादमी की ओर से मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर मांग की है कि माधुरीकुण्ड फॉर्म पर एक एग्रीकल्चर कॉलेज ही खोल दिया जाए ताकि फॉर्म का कुछ बेहतर उपयोग हो ंसके। उन्होंने शासन से यह मांग पूर्व में वेटरिनरी विवि को केन्द्रीय पशुपालन विवि बनाए जाने की मांग को ठंडे बस्ते में डाले जाने के बाद की है।

कर्मचारी विहीन हो गया अब फॉर्म
लम्बे समय से विनियमितीकरण की मांग कर रहे कर्मचारियों का पिछले दिनों विनियमितीकरण कर दिया गया। इनमें 80 श्रमिक हैं। इसके अलावा वाहन चालक, लिपिक संवर्ग आदि को मिलाकर एक सैकड़ा कर्मचारियों को विनियमितीकृत करके वेटरिनरी विश्वविद्यालय बुला लिया गया है। इधर संविदा पर लगे इतने ही कर्मचारी विवि प्रशासन द्वारा हटाए गए हैं। ऐसे में पूर्व से ही आधे फॉर्म पर खेती होती रही। नई और भाडे़ पर बुलाई जाने वाली लेबर से तो 25 फीसदी फॉर्म पर भी बुबाई और ठीक से उत्पादन होने की संभाना क्षींण हो गई है। कुल मिलाकर विश्वविद्यालय न तो एक दशक में गौधन विकास के नाम पर स्थानीय लोगों को चंद बेहतर नस्ल की बछिया दे पाया और न ही कीमती फॉर्म को ही ठीक से संचालित कर पाया है।