जवाहर बाग कांडः डीएनए में उलझ गया रामवृक्ष के जिंदा-मुर्दा का रहस्य

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मथुरा। जनपद में वर्ष 2016 में 2 जून को हुए जवाहर बाग कांड की यादें आज भी स्थानीय लोगों के जेहन में ताजा हैं। स्थानीय लोग आज भी उस हिंसात्मक शाम को भूले नहीं हैं। जैसे ही लोगों को पुलिस द्वारा जवाहर बाग खाली कराए जाने और इस प्रयास में दो पुलिस अधिकारियों के शहीद होने की जानकारी मिली थी। शहर वासी जवाहर बाग की ओर दौड़ लिए थे। पुलिस ने कड़ी कार्रवाई करते हुए जवाहर बाग को खाली करा लिया था लेकिन इस कार्रवाई में 2 पुलिस अधिकारियों सहित 29 लोगों की मौत हो गई थी। करीब 175 लोगों को पकड़ा गया था। जबकि संगठन के सर्वेसर्वा रामवृक्ष यादव को मृत घोषित किया गया। हालांकि उसकी मौत को आज भी प्रदेश पुलिस और सीबीआई साबित नहीं कर सकी है।
वर्ष 2013 में स्वाधीन भारत विधिक सत्याग्रह की स्थापना करने वाले रामवृक्ष यादव ने 11 जनवरी 2014 को मध्य प्रदेश के सागर जिले से अपनी यात्रा आरंभ की थी। फरवरी 2014 में वह मथुरा आया और जवाहर बाग में पहुंच गया। इसके बाद तो उसने धीरे-धीरे 280 एकड़ के पूरे जवाहर बाग पर ही कब्जा कर लिया। जब भी किसी भी अधिकारी ने जवाहर बाग खाली कराने का प्रयास किया तो रामवृक्ष यादव ने जवाहर बाग में मौजूद अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ अधिकारियों को कई बार बंधक बनाते हुए सभी प्रयासों को विफल कर दिया। यहां तक कि उसने जवाहर बाग के अंदर स्थित उद्यान विभाग के कार्यालय पर भी कब्जा कर लिया था। पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों ने 1 जून 2016 को जवाहर बाग खाली कराने की योजना तैयार की। 2 जून 2016 को तत्कालीन एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी जवाहर बाग खाली कराने पहुंचे। लेकिन जवाहर बाग में मौजूद कथित सत्याग्रहियों ने एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी और तत्कालीन थानाध्यक्ष संतोष यादव की हत्या कर दी। इस हिंसा में 27 कब्जाधारियों के भी शव जवाहर बाग में मिले थे। शेष कब्जा धारियों को भगा दिया गया तो करीब 175 लोगों को पकड़ा भी गया। इनमें महिलाएं भी शामिल थीं। इनमें से 101 लोगों के खिलाफ धारा 302 का मुकदमा पंजीकृत किया गया। 5 जून को डीजीपी उप्र और 6 जून को स्थानीय पुलिस ने दावा किया कि संगठन का सर्वेसर्वा रामवृक्ष यादव मारा गया है लेकिन पुलिस इसे साबित नहीं कर सकी है और न ही अभी तक कोई इस पक्ष में कोई भी वैज्ञानिक आधार पेश कर सकी है। मार्च 2017 में हाईकोर्ट ने इस केस में सीबीआई जांच के आदेश दिए लेकिन सीबीआई के हाथ भी अभी तक खाली ही हैं।

रामवृक्ष यादव से वार्ता करते हुए विषबाण के संपादक मफतलाल अग्रवाल (फाइल फोटो)

जबकि रामवृक्ष यादव की मौत को साबित करने के लिए रामवृक्ष के बेटे राजनारायन और विवेक यादव के ब्लड सैंपल भी लिए गए थे लेकिन उनके डीएनए सैंपल की भी रिपोर्ट अभी तक नहीं आ सकी है। जनपद में हुए इतने बड़े हिंसक कांड में सीबीआई और प्रदेश पुलिस की सुस्ती काफी चौंकाती है। घटना के समय प्रदेश में सपा सरकार का शासन था तो लोगों में यह चर्चा आम थी कि रामवृक्ष यादव को परोक्ष रुप से सरकार के एक कद्दावर मंत्री का आर्शीवाद प्राप्त था। जब 2017 में प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी तो लोगों को उम्मीदें बंधी कि शायद अब जवाहर बाग कांड की जांच शीघ्र पूरी होगी और जवाहर बाग कांड में दोषियों को सजा मिलेगी लेकिन अब भी सीबीआई और पुलिस किसी भी नतीजे पर पहुंच सके हैं। जवाहर बाग कांड में बचाव पक्ष के अधिवक्ता एलके गौतम ने विषबाए को बातचीत में बताया कि वर्तमान में जवाहर बाग कांड में पकड़े गए लोगों में से कुल 140 लोग विभिन्न जेलों में हैं। जबकि धारा 302 में निरुद्ध किए गए 101 लोगों में से एक आरोपी को अव्यस्क होने के चलते जुबेनाईल में भेज दिया गया। 3 आरोपियों की मौत हो गई। जबकि करीब एक दर्जन आरोपी फिलहाल जमानत पर चल रहे हैं। बताया कि उप्र पुलिस और सीबीआई तीन साल में रामवृक्ष यादव की मौत की ही पुष्टि नहीं कर सकी है। जबकि वह अपने रिकार्ड में उसे मृत बता रही है।

अभी तक नहीं लौट सकी जवाहर बाग की हरियाली
जवाहर बाग पर अवैध कब्जा होने से पूर्व इसकी हरियाली लोगों को काफी लुभाती थी। तहसील और कचहरी आने वाले गांव देहात के व्यक्ति गर्मी-सर्दी में यही आकर बैठ जाते थे और अपना समय व्यतीत करते थे। गर्मी से बचने के लिए हरे-भरे पेड़ां का सहारा लेते थे तो सर्दी में धूप में बैठकर आनंद उठाते थे। इसके साथ ही आसपास के स्थानीय लोग यहां सुबह और शाम को टहलने के लिए भी जाते थे। लेकिन वर्ष 2014 में स्वाधीन भारत विधिक सत्याग्रह संगठन द्वारा इस पर कब्जा करने के साथ ही यह सब समाप्त होता चला गया। जवाहर बाग में मौजूद सैकड़ों लोगों ने धीरे-धीरे आम लोगों का यहां प्रवेश बंद कर दिया। इसके बाद तो पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी भी यहां बिना संगठन की मर्जी के अंदर प्रवेश नहीं कर पाते थे। खाली कराने के दौरान हुई हिंसा में जवाहर बाग जलकर राख हो गया। इसे देखते हुए सरकार ने करीब 16 करोड़ की लागत से जवाहर बाग को फिर से सजाने की योजना तैयार की। इस लागत से करीब तीन दर्जन काम होने थे। इसके तहत जवाहर बाग को पिकनिक स्पॉट के रुप में विकसित करने की योजना बनाई गई थी लेकिन यह काम अभी तक धरातल पर नहीं उतर सका है। वर्ष 2017 में कार्यदायी संस्था राजकीय निर्माण निगम द्वारा काम शुरु किया गया और वर्ष 2018 तक सिर्फ 3 फीसदी काम ही पूरा हो सका। सौंदर्यीकरण की धीमी गति पर सवाल उठे तो निर्माण निगम से काम ले लिया गया और अक्टूबर 2018 में सीएंडडीएस को काम दे दिया गया है। फिलहाल यही एजेंसी निर्माण और सौंदर्यीकरण का काम देख रही है। संभावना जताई जा रही है कि वर्ष 2020 के शुरुआत में यह काम पूरा हो जाएगा।