बालाकोट स्ट्राइक-प्रयाग महाकुम्भ ने लिखी मोदी की प्रचंड जीत की पटकथा!

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भाजपा के ‘राष्ट्रवाद और हिंदुत्व’ के गठजोड़ की काट अंत तक नहीं ढूंढ पाया विपक्ष

जगदीश वर्मा ‘समन्दर’
नई दिल्ली।  लोकसभा 2019 के परिणामों में मोदी सरकार को मिले हिंदूवादी विचारधारा के समर्थन को देखकर लगता है कि जनवरी में प्रयाग कुम्भ के विशाल आयोजन और बेहतरीन व्यवस्थाओं के बीच ही मोदी सरकार ने पुनः जीत की पटकथा लिख ली थी। प्रयाग कुम्भ में सरकार ने न केवल भारत की आस्थावान जनता का मन जीता बल्कि अपनी हिंदुत्ववादी छवि को और प्रखर किया। मोदी सरकार ने पांच साल पूर्ण होने पर मिले इस अवसर का अपने कार्यों के प्रचार-प्रसार के लिये भी पूरी तरह सदुपयोग किया।


योगी सरकार के साथ केंद्र की जुगलबंदी ने इस आयोजन को इतना विशेष और आकर्षक बना दिया था कि संपूर्ण भारत से आए सनातन धर्मी यहां से सरकार के एजेंडे और हिंदुत्व के प्रति निष्ठा की तस्वीर लेकर ही लौटे। इस तस्वीर ने भाजपा के हिंदुत्व कार्ड को और मजबूत कर दिया। जिसका मोदी सरकार की वापसी में अहम योगदान है। एक दावे के मुताबिक उत्तर प्रदेश के प्रयाग कुम्भ 2019 में देश के विभिन्न राज्यों से लगभग 16 करोड़ों लोगों ने भाग लिया। 10 करोड़ लोगों के मोबाइल पर तो सरकार ने ही मैसेज भेजकर कुंभ में आने का निमंत्रण दिया था। यहां से लौटे श्रद्धालु अपने राज्यों तक मोदी सरकार की उपलब्धियों का बखान भी लेकर भी गए थे।
पहली बार श्रद्धालुओं के लिए पूरे कुम्भ में इतने शानदार इंतजाम किये गये कि स्वच्छता और अन्य व्यवस्थाओं को लेकर इसे न सिर्फ देश में वरन् विदेशों में भी सराहा गया बल्कि विरोधियों को भी इसकी तारीफ करनी पड़ी। ट्रांसपोर्ट,लाईट, सुरक्षा, संवाद, स्वच्छता, जनसुविधाएं जैसी परंपरागत व्यवस्थाओं के साथ ही योगी सरकार द्वारा युवा जनरेशन से सीधे जुड़ते हुए मुफ्त इंटरनेट और सेल्फी प्वाइंट तक बनाए गए थे। दो माह से ज्यादा तक आयोजित हुए विशाल कुम्भ में मोदी सरकार की विभिन्न योजनाओं और उपलब्धियों का जमकर प्रचार-प्रसार किया गया । व्यवस्थाओं का आनंद लेते भक्तों में इसका सकारात्मक संदेश ही गया।
़इस दौरान योगी-मोदी सरकार के बड़े मंत्री एवं भाजपा पदाधिकारी कुम्भ में स्नान पूजा कर आमजनता की भावना में साथ देते नजर आए। धर्म संसद के माध्यम से संघ ने भी बीजेपी के लिए संतों को एकमंच पर लाने के प्रयास कुम्भ में किए। कुम्भ समापन पर स्वच्छकारों के चरण धोकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश में जातिवादी विचारधारा से ऊपर उठने का संदेश देने में भी सफल रहे। चुनाव परिणामों को देखकर लगता है कि पिछड़े एवं दलित मतदाताओं को यह तस्वीर सपा-बसपा-रालोद महागठबंधन से ज्यादा सुहावनी लगी ।

‘हिन्दुत्व’ के बाद ‘राष्ट्रवाद’ की लहर ने की जीत आसान

हांलाकि प्रयाग कुम्भ पूर्ण होते-होते हिंदुवादी सरकार के लिये नयी चुनौती ले आया था, यह चुनौती थी राममंदिर निर्माण को लेकर मोदी सरकार से संतों की अपेक्षाओं की। द्वादश-ज्योतिष्पीठ शकंराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज ने कुम्भ पूर्ण होने से पहले ही राममंदिर निर्माण के लिये अयोध्या कूच करने की घोषणा से मोदी-योगी सरकार को सकते में ला दिया था। राममंदिर को लेकर शंकराचार्य के साथ संत समाज का एक धड़ा लामबंद भी होने लगा था। इसी समय पुलवामा हमले में 42 सैनिकों की शहादत के बाद यह कोशिश शुरू होने से पहले ही धराशायी हो गयी। योगी सरकार ने राष्ट्रहित में इस आंदोलन को स्थगित करने के लिए स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से आग्रह किया। इसे मान लिया गया। राममंदिर पर मोदी सरकार को घेरने की कोशिशें समाप्त हो गई। मोदी सरकार ने पुलवामा के इस हमले का बदला पाकिस्तान में एयर स्ट्राईक से लिया तो देश में ‘हिंदुत्व’ से ऊपर उठकर ‘राष्ट्रवाद’ की लहर बहने लगी। ‘राष्ट्रवाद’ की इस लहर ने मोदी सरकार से होने वाली सारी शिकायतों को किनारे लगा दिया। विपक्ष ने भी शुरूआत में इस लहर का साथ दिया लेकिन बाद में पाकिस्तान में की गयी भारतीय सेना की कार्यवाही का सबूत मांगने पर वह इसी लहर में डूब गया। रही-सही कसर कांग्रेस के चुनावी घोषणा पत्र ने पूरी कर दी। जिसमें ‘राष्ट्रद्रोह’ जैसी धारा को हल्का करने की बात कही गयी। ‘राष्ट्रवाद’ में उफनते लोगों को यह सीधे देश के विरूद्ध किया जाने वाला ‘वायदा’ लगा।
अंतिम चरण में पश्चिम बंगाल के मतदान से पहले नरेंद्र मोदी की केदारनाथ में उपस्थिति ने केसरिया रंग को और गाढ़ा कर दिया। ‘भाजपा के राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व’ के इस गठजोड़ की काट विपक्ष अंत तक नहीं ढूंढ पाया। कांग्रेस, सपा, बसपा, रालोद जैसे दलों ने इस पर चलने की बजाय इनके बेजा इस्तेमाल पर ‘सवाल’ उठाये जबकि भाजपा ने बिना झिझक हर तरह से इसका उपयोग अपने प्रचार में किया। विपक्ष चुनाव आयोग से लेकर कोर्ट तक अपने ‘राष्ट्रवाद’ की परिभाषा बताता रहा, लेकिन भावनाओं में बहते लोगों को मोदी ही किनारा नजर आए। मोदी सरकार के अंतिम 6 माह में उस पर उठने वाले अधिकांश ‘सवाल’ खुद ही ‘जवाब’ बनते चले गए और जीत भाजपा के पाले में आ गयी।