30 करोड़ खर्च, शिक्षा व्यवस्था ध्वस्त, सरकारी स्कूलों में कब पढ़ेंगे अफसरों-नेताओं के बच्चे

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मथुरा। कान्वेंट स्कूलों में कमरतोड़ फीस, यूनिफार्म, किताब-कॉपियों के कमीशन के चलते ऊंचे दाम, एक्टिविटी फीस के नाम पर उगाही आदि से शोषण के बाद भी मध्यम वर्ग इन्हीं स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए मजबूर है। जबकि सरकार द्वारा प्रत्येक गांव में सरकारी विद्यालय खोले हुए हैं। जहां निशुल्क शिक्षा, यूनिफार्म, दोपहर का खाना, स्वेटर, जूते-मोजे, बैग आदि निशुल्क ही बच्चों को मुहैया कराए जाते हैं। इसके बाद भी अभिभावक सरकारी स्कूल में अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए आसानी से तैयार नहीं होते हैं। इसका कारण है सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति, विद्यालयों में मूलभूत सुविधाएं न होना और शिक्षकों का विद्यालय में ईमानदारी से पठन-पाठन पर ध्यान न देना।
संभवतः यही कारण रहे कि उच्च न्यायालय द्वारा वर्ष 2015 में सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों के बच्चों को सरकारी विद्यालयों में ही पढ़ाने संबंधी आदेश जारी किया गया लेकिन यह आदेश फाइलों में दबा हुआ धूल फांक रहा है। चार वर्ष बीतने के बाद भी इस आदेश पर अमल नहीं किया जा सका है। यह आदेश सरकारी विद्यालयों में शिक्षा की बदहाल स्थिति को सुधारने के लिए दिया गया था। जबकि सरकारी स्कूलों पर प्रतिमाह करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं। हाईकोर्ट को लगा था कि यदि सरकारी अधिकारियों, जन प्रतिनिधियों के बच्चे यदि सरकारी स्कूलों में पढ़ेंगे तो यहां शिक्षा के स्तर में सुधार होगा लेकिन इस आदेश का पालन करने में किसी भी जिम्मेदार अधिकारी ने दिलचस्पी नहीं दिखाई। जबकि प्रतिमाह मथुरा जनपद में ही शिक्षा पर करोड़ों रुपए खर्च हो रहे हैं।


प्रदेश के प्राईमरी और पूर्व माध्यमिक विद्यालयों सहित माध्यमिक शिक्षा परिषद् के विद्यालयों की बदहाल स्थिति किसी से छिपी नहीं है। इसमें भी परिषद् के प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षा का स्तर निम्न स्तर पर पहुंच चुका है। पठन पाठन की स्थिति काफी बदहाल हो चुकी है। सरकारी शिक्षक विद्यालयों में मन लगाकर पढ़ाने से कतरा रहे हैं। कई रिपोर्ट्स में परिषदीय स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के पठन-पाठन की स्थिति को बदहाल बताया गया है। संभवतः इसे ध्यान में रखते हुए ही 18 अगस्त 2015 में उच्च न्यायालय प्रयागराज ने प्रदेश के मुख्य सचिव को आदेश दिया था कि वह अन्य अधिकारियों से परामर्श कर यह सुनिश्चित करें कि सरकारी, अर्द्धसरकारी विभागों के सेवकों, स्थानीय निकायों के जन प्रतिनिधियों, न्यायपालिका एवं सरकारी खजाने से वेतन, मानदेय या धन प्राप्त करने वाले लोगों के बच्चे अनिवार्य रूप से बोर्ड द्वारा संचालित सरकारी प्राथमिक स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करें। ऐसा न करने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाए। यदि कोई कान्वेंट स्कूल में अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए भेजे तो उस स्कूल में दी जाने वाली फीस के बराबर धनराशि उसके द्वारा प्राप्त सरकारी खजाने में प्रतिमाह जमा कराई जाए। साथ ही ऐसे लोगों का इंक्रीमेंट, प्रमोशन कुछ समय के लिए रोकने की व्यवस्था करने का आदेश लागू किया जाए। ताकि इन विद्यालयों में शिक्षा का स्तर सुधारा जा सके।


हाईकोर्ट का मानना था कि यदि सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों एवं सांसद, विधायक, सभासद आदि राजनेताओं के बच्चे यदि स्कूल में पढ़ेंगे तो वह स्कूल की बदहाल स्थिति पर ध्यान देते हुए उसे सुधारने का प्रयास करेंगे साथ ही शिक्षक भी समय से स्कूल पहुंचकर पठन-पाठन पर ध्यान देंगे लेकिन उच्च न्यायालय का यह आदेश अभी भी धूल फांक रहा है। मथुरा जनपद में भी एक भी ऐसा सरकारी अधिकारी, कर्मचारी अथवा जन प्रतिनिधि नहीं है। जिसके बच्चे परिषदीय विद्यालयों में पढ़ रहे हों। अन्य विभागों के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को छोड़ दें खुद सरकारी शिक्षक ही अपने बच्चों को इन स्कूलों में पढ़ाना पसंद नहीं करते हैं। जबकि मथुरा जनपद में ही प्रति माह करोड़ों रुपए शिक्षकों के वेतन, मिड डे मील, यूनिफार्म, स्वेटर, जूते, बैग आदि में खर्च किए जा रहे हैं। हालांकि कुछ ऐसे परिषदीय स्कूल भी हैं जो कि सरकारी स्कूलों में शिक्षा की बदहाल स्थिति के मिथक को तोड़ने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन फिलहाल यह प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं। इस संबंध में मथुरा जनपद की स्थिति पर वार्ता करने के लिए जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी चंद्रशेखर को दो बार फोन किया गया लेकिन उन्होंने फोन अटेंड नहीं किया।

मथुरा में बेसिक शिक्षा विभाग एक नजर में
– लगभग 2 हजार विद्यालय प्राईमरी और उच्च प्राथमिक विद्यालय मिलाकर
– जनपद में कार्यरत शिक्षक लगभग 4500
– शिक्षक एवं शिक्षणेत्तर कर्मचारियों के वेतन में खर्च लगभग 25 करोड़ रुपए
– जनपद में कार्यरत शिक्षामित्र लगभग 1900 मानदेय 10 हजार रुपए प्रति माह
– जनपद में कार्यरत अनुदेशक लगभग 170 मानदेय 8700 रुपए प्रति माह
– मिड डे मील, यूनिफार्म, किताब-कॉपी, जूते-मोजे, बैग, स्वेटर आदि पर प्रतिवर्ष करोड़ों खर्च