राजनेताओं के लिए चुनावी फसल बनी छाता की शुगर मिल

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मथुरा। लोकसभा चुनाव के द्वितीय चरण का चुनाव प्रचार अपने पूरे शबाब पर है। मतदाताओं, किसानों, मजदूरों, युवा, महिलाओं को लुभाने के लिए ताबड़तोड़ वायदे किए जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर हजारों लोगों को रोजगार एवं किसानों के लिए वरदान मानी जाने वाली छाता चीनी मिल बंद होने के बाद अब नेताओं के लिए चुनावी फसल साबित हो रही है। कोई राजनेता सैकड़ों करोड़ की जमीन पर कब्जा करने की फिराक में है। तो कोई चीनी मिल चालू कराने का स्वप्न दिखाकर चुनावी नैया पार लगाने में सफल होने के प्रयास कर रहा है। राजनेताओं का यह पैंतरा पहले भी सफल होता रहा है। रोजगार की चाह में वोट देने वाले किसान और युवा ठगे से रह जाते हैं। इस बार भी चीनी मिल को चुनावी मुद्दा बनाकर राजनैतिक नेता किसानों के वोट हासिल करने की जुगत में हैं। देखना होगा कि इस बार फिर छाता शुगर मिल नेताओं की किस्मत को चमकाने में सफल हो पाती है अथवा नहीं।  विषबाण से मफतलाल अग्रवाल की खास रिपोर्ट

मफतलाल अग्रवाल
संपादक विषबाण मीडिया ग्रुप

मथुरा-दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग दो पर छाता में आगरा मंडल की एकमात्र चीनी मिल का शुभारंभ करीब साढे़ चार दशक पूर्व 10 फरवरी 1974 को तत्कालीन वित्त भारी उद्योग एवं चीनी मिल मंत्री स्व. नारायणदत्त तिवारी ने किया था। चीनी मिल का शुभारंभ होने के बाद इस मिल में न सिर्फ प्रतिदिन 2500 बोरी चीनी का उत्पादन होने लगा। वरन् 41 लाख क्विंटल से अधिक गन्ना एक सत्र में पिराई का रिकार्ड भी बना था। इस शुगर मिल में 46 हजार किसान अपना गन्ना देते थे। इसके लिए पूरे जनपद में 36 गन्ना खरीद केंद्र थे। जहां से शुगर मिल को गन्ना भेजा जाता था। एक तरफ शुगर मिल अपना रिकार्ड बना रही थी तो दूसरी तरफ किसान-मजदूरों के चेहरों पर लाली छा रही थी। इसे देखकर नेता-अफसरों में बेचैनी होने लगी और फिर उन्होंने ऐसा गठजोड़ बनाया कि चीनी मिल में घाटा दर घाटा दिखाते हुए प्रदेश की बसपा सरकार में ही कृषि मंत्री एवं क्षेत्रीय विधायक चौधरी लक्ष्मीनारायण की देखरेख में वर्ष 2008-09 के पिराई सत्र में मिल पर ताला लगा दिया गया। इसके साथ ही करीब 100 एकड़ क्षेत्र में हाइवे किनारे की इस बेशकीमती जमीन के साथ इस चीनी मिल को अपने ही निकटतम लोगों को देने के लिए मायावती सरकार ने इसे नीलाम करने का प्रयास किया, लेकिन छाता किसान संघर्ष समिति को नीलामी पर हाईकोर्ट से स्टे मिलने के चलते सरकार सफल नहीं हो सकी। वर्ष 2012 में सपा सरकार बनने के बाद क्षेत्रीय किसानों में उम्मीद जगी कि शायद अब मिल शुरु हो जाएगी लेकिन यह स्वप्न पूरा नहीं हो सका। वर्ष 2017 में भाजपा की योगी सरकार बनने के बाद भी किसानों की यह आस पूरी नहीं हो सकी है।

तत्कालीन विधायक स्व. बाबू तेजपाल सिंह (फाइल फोटो)

हाईकोर्ट भी दे चुका है मिल चालू करने के आदेश
छाता शुगर मिल चालू कराने में तत्कालीन क्षेत्रीय कांग्रेस विधायक बाबू तेजपाल सिंह का महत्वपूर्ण योगदान रहा था। उनके ही पौत्र राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के ब्रज प्रांत अध्यक्ष दीपक चौधरी की जनहित याचिका पर हाईकोर्ट ने वर्ष 2018 में मिल चालू कराने के आदेश भी जारी किए थे। कोर्ट ने यह भी कहा था कि यदि पुरानी मिल चालू नहीं हो सकती है तो इसके स्थान पर नई मिल स्थापित की जाए। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी 350 करोड़ से छाता शुगर चालू कराने की घोषणा की थी। इसके तुरंत बाद छाता विधायक और प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री चौधरी लक्ष्मीनारायण ने खुशी व्यक्त करते हुए कहा था कि उन्होंने चुनाव में किसानों से चीनी मिल शुरु कराने का वादा किया था। वादा पूरा करते हुए नई चीनी मिल छाता में लगवाई जा रही है। अगले साल तक चीनी मिल गन्ने की खरीद शुरु कर देगी। इससे किसानों को बड़ा लाभ मिलेगा। एक तरफ शुगर मिल चालू करने की डीपीआर बनाई जा रही थी और दूसरी तरफ गन्ना विभाग भी क्षेत्रीय किसानों को गन्ना की खेती के लिए प्रेरित करने के प्रयास में जुट गया। लेकिन गन्ने का रकबा बढ़ नहीं सका और सरकार ने शुगर मिल चालू न करने के लिए एक आधार मिल गया और सरकार ने अपने हाथ पीछे खींच लिए।

राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के ब्रज प्रांत अध्यक्ष दीपक चौधरी

क्षेत्रीय किसान भी लड़ रहे मिल के अस्तित्व की लड़ाई
राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के ब्रज प्रांत अध्यक्ष दीपक चौधरी मिल चालू कराने के लिए कोर्ट से लेकर सड़क तक की लड़ाई लड़ रहे हैं। दीपक चौधरी कहते हैं कि मिल के चालू रहने के दौरान जहां हजारों किसानों को इससे लाभ था। वहीं मिल में सीधे तौर पर करीब 9000 अधिकारी-कर्मचारी और मजदूर भी कार्यरत थे। इसके बंद होने से किसानों की खुशहाली गई तो युवाओं का रोजगार भी चला गया। स्थानीय किसान और किसान संगठन भी उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर मिल चालू कराने के लिए प्रयासरत हैं। कई बार मिल के गेट पर ही धरना-प्रदर्शन किए गए हैं। रान्हेरा के किसान रमेश, डा.ॅ अशोक कुमार कहते हैं कि शुगर मिल के चलने के दौरान क्षेत्र में किसान गन्ना की खेती करते थे। उन्हें काफी अच्छा लाभ होता था। लेकिन मिल बंद होने के बाद गन्ने की खेती भी बंद हो गई और किसान धान की खेती करने लगे। धान की खेती में उन्हें नुकसान होता है लेकिन गन्ने की खेती अधिकांश फायदे का सौदा ही साबित रही है।

छाता शुगर मिल की जर्जर हो चुकी मशीनें

कर्मचारियों से आबाद रहने वाली मिल बनी कबाड़घर
विषबाण की टीम गत दिवस जब छाता शुगर मिल पहुंची तो मिल की हालत किसी कबाड़घर से कम नहीं लग रही थी। हजारों कर्मचारियों और उनके परिवारों से कभी आबाद रहने वाली यह मिल अब भुतहा खंडहर की माफिक लग रही थी। सैकड़ों बंदर यहां उछलकूद करते हुए दिखे तो कुत्ते भी काफी संख्या में घूम रहे थे। इससे एक बार तो मिल में घुसने में भय लगा। मिल में घुसने के साथ ही झाड़ियां शुरु गईं। अंदर जंगल जैसा नजारा था। थोड़ा अंदर घुसे तो कुत्ते और बंदर टीम पर झपटे लेकिन तभी अंदर की तरफ से आए चौकीदार ने उन्हें भगाया। चौकीदार नरेश जादौन यहां सुरक्षा में लगे हैं। कहते हैं कि वर्तमान में मिल की सुरक्षा के लिए 15 सिक्योरिटी गार्ड तैनात हैं और 3 गनमैन हैं। नरेश कहते हैं कि रात्रि में यहां सोने में डर लगता है। घनी झाड़ियां होने के कारण कई बार यहां सांप भी निकल आते हैं। रोशनी के लिए 3 जनरेटर की व्यवस्था है। बताया कि हाल ही में यहां के पानी की सैंपलिंग हुई है।

– पूर्व विधायक छाता तेजपाल सिंह कहते हैं कि चीनी मिल बंद को अपने निजी स्वार्थ के लिए बंद कराया गया। उन्होंने अपने प्रतिद्वंदी भाजपा से विधायक और प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री चौधरी लक्ष्मीनारायन पर आरोप लगाया कि जब मिल बंद हुई तो उस वह बसपा सरकार में कृषि मंत्री थे लेकिन फिर भी मिल बंद हुई। किसानों का भला नहीं हुआ वरन् उनका नुकसान हुआ। कहा कि मैंने सपा सरकार में मिल चालू कराने के लिए काफी प्रयास किए। तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से भी मुलाकात की लेकिन दुर्भाग्यवश मिल चालू नहीं हो सकी। वह अभी भी मिल चालू कराने के प्रयासों में लगे हुए हैं।
– कैबिनेट मंत्री चौधरी लक्ष्मीनारायण से मिल के संबंध में वार्ता करने का प्रयास किया गया लेकिन उनके चुनावी सभा में होने के कारण उनकी आवाज स्पष्ट नहीं आ रही थी। उन्हें मैसेज भी किया गया लेकिन देररात तक उनका कोई जवाब नहीं मिल सका था।