रालोद मुखिया और युवराज बदल सकते हैं ‘कर्मभूमि’ !!

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चंद्रशेखर गौड़
मथुरा। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने अपने गठबंधन का ऐलान करते हुए प्रदेश की 80 सीटों में से 76 सीटें आपस में आधी-आधी बांट ली हैं। राजनीति के सूत्रों की मानें तो शेष चार सीटों में से दो सीटें रायबरेली और अमेठी कांग्रेस के लिए छोड़ी गई हैं। वहीं दो सीटें रालोद के लिए छोड़ी गई मानी जा रही हैं। जबकि रालोद के दिग्गज नेताओं में हलचल मच गई है। बदले हुए समीकरणों के बाद रालोद के मुखिया और युवराज दोनों अपनी-अपनी सीटें छोड़कर अन्य लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने के फेर में हैं।
किसानों के मसीहा माने जाने वाले किसान नेता और प्रधानमंत्री रहे चौधरी चरण सिंह के पुत्र चौ. अजीत सिंह ने का जन्म तो मेरठ में हुआ था लेकिन उन्होंने अपनी कर्मभूमि बागपत को बनाया और यहां से सात बार लोकसभा चुनाव जीत कर संसद में किसान हित में आवाज बुलंद की। वहीं उनके पुत्र जयंत चौधरी ने मिनी बागपत माने जाने वाले मथुरा सीट को अपनी कर्मभूमि बनाते हुए वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में मथुरा की राजनीति के चाणक्य माने जाने वाले और मांट विधानसभा से आठ बार के विधायक पं. श्यामसुंदर शर्मा को एक बडे़ अंतर से हराकर चुनाव जीता था और संसद पहुंचे थे। एक समय पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान, जाट और मुस्लिम वोटों में अपनी गहरी पकड़ रखने वाले अजीत सिंह को वर्ष 2014 में मोदी लहर के सामने बुरी तरह हार का मुंह देखना पड़ा। वर्ष 2014 के आम चुनावों में रालोद के खाते में एक भी सीट नहीं आई थी। बागपत से स्वयं अजीत सिंह हार गए थे तो मिनी बागपत कहे जाने वाले मथुरा सीट पर जयंत चौधरी को भाजपा की हेमामालिनी के सामने हार का मुंह देखना पड़ा था। दरअसल अजीत सिंह की एक बड़ी ताकत पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट-मुस्लिम वोट रहे हैं और मुजफ्फरनगर दंगे के बाद यह दोनों ही मतदाता उनसे खिसक गए। अब सपा-बसपा गठबंधन के अनुसार मानें तो उन्हें प्रदेश में मात्र दो ही सीटें मिल रही हैं। ऐसे में रालोद के सामने अपना वजूद बनाए रखने की चुनौती उत्पन्न हो गई है। हालांकि रालोद के समक्ष कांग्रेस के साथ गठबंधन करने का विकल्प खुला हुआ है। वहीं यह भी माना जा रहा है कि सपा-बसपा मुखिया से भी अभी बातचीत का दौर बंद नहीं हुआ है। राजनीतिक सूत्रों की मानें तो अब वर्तमान स्थितियों पर गौर करते हुए रालोद मुखया अजीत सिंह अपनी कर्मभूमि बागपत को अपने पुत्र जयंत चौधरी के लिए छोड़ सकते हैं। वहीं अजीत सिंह स्वयं मुजफ्फनगर की सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। माना जा रहा है कि अजीत सिंह ने मुजफ्फरनगर सीट को इसलिए चुना है क्योंकि दंगों के बाद से उनका जो वोट बैंक उनसे नाराज होकर खिसक गया है उसे वापस अपने पाले में किया जा सके। साथ ही बागपत की सीट पर पुत्र जयंत चौधरी को जीतने में अधिक मशक्कत का सामना न करना पडे़ क्योंकि इस सीट पर वह स्वयं सात बार सांसद रहे हैं। ऐसे में इस जनपद में उनका काफी वोट बैंक है जोकि उनके पुत्र को जिताकर संसद में भेज सकता है।