ये देखो कैसे बह रही है कान्हा की नगरी में नकली दूध, घी, मावा की नदियाँ

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मथुरा। जिस बृज में कभी दूध की नदियाँ बहा करती थीं आज उस कान्हा की नगरी में माफिया खाद्य विभाग के अफसरों, पुलिस-प्रशासन के संरक्षण में नकली एवं जहरीले सिंथैटिक दूध, मावा (खोवा), देशी घी, तेल, दही की पग-पग पर नदियां बहाकर आम जनता की जिंदगी को मौत के दरिया में धकेलने में लगे हुए हैं। जिससे आम जनता गंभीर बीमारियों का शिकार हो रही है।
पिछले दिनों देश में खाद्य वस्तुओं में मिलावट खोरी की बढ़ती घटनाओं पर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार को मिलावट रोकने के लिये सख्त कानून बनाने के निर्देश दिये जाने के बाद फूड सेफ्टी एण्ड स्टैंड्डर्स अथॉरिटी ऑफ इण्डिया ;एफएसएसआईद्ध ने मिलावट पर रोक लगाने के लिये दोषी व्यक्तियों को उम्रकैद एवं 10 लाख तक के जुर्माने का प्रावधान करते हुए केन्द्र सरकार को अपनी रिपोर्ट प्रेषित करते हुए मिलावट रोकने के लिये आम जनता से भी सुझाव मांगे गये थे। लेकिन इसके बाबजूद जनपद में सख्त खाद्य सुरक्षा कानून माफियाओं के लिये माखौल बन कर रहा गया है। वहीं खाद्य विभाग के अफसरों के लिये यह कानून सोने का अण्डा देने वाली मुर्गी साबित हो रही है।
इसका खुलासा ‘‘विषबाण’’ टीम द्वारा कई दिनों की जांच पड़ताल के बाद मिलावट खोर माफियाओं एवं खाद्य विभाग के अफसरों का गठजोड़ के रूप में सामने आया। जहां जनपद के कस्बा बाजना, नौहझील एवं आसपास के क्षेत्र में बडे़ पैमाने पर संचालित पनीर डेयरियों पर जहां दूध के स्थान पर पाउडर से पनीर का निर्माण धड़ल्ले से हो रहा था। बल्कि रिफाइण्ड से नकली देशी घी का निर्माण भी बेधड़क हो रहा था। दिन छिपते ही पेटियों में बंद कर पनीर को मैक्स- मैटाडोर गाड़ियों में भरकर रात्रि 2 बजे के बाद दिल्ली-नोएडा की मण्डियों में भेजा जा रहा था।
नाम ना खोलने की शर्त पर कुछ डेयरी संचालकों ने बताया कि फूड विभाग के अधिकारी प्रतिमाह यूनियन पदाधिकारियों से एकमुश्त मोटी रकम वसूलते हैं। बल्कि पुलिस-प्रशासन के अधिकारी- कर्मचारी भी पनीर-घी के साथ-साथ महीनेदारी वसूलते हैं। सूत्र बताते हैं कि दूध-पनीर डेयरियों का जाल गांव-गांव तक फैला हुआ है। जहां यूरिया, सतरीढ़ा, रिफाइण्ड, कास्टिक सोड़ा आदि घातक वस्तुओं के मिश्रण से दूध का निर्माण कर दूधिया
दुकानों से लेकर घर-घर में दूध आपूर्ति करते हैं। ‘‘विषबाण’’ टीम द्वारा खोजबीन में राया क्षेत्र नकली मावा, दही, मिलावटी मसाले की बड़ी मण्डी निकला। जांच में क्षेत्र के मडैम, जैसवां, खिरारी, दखनी नगरा, कारव, हवेली आदि गांवों में बड़े पैमाने पर मिलावटी खाद्य वस्तुओं का निर्माण होता पाया गया। मथुरा-राया मार्ग पर स्थित सड़क किनारे बसे गोसना गांव में मावा, देशी घी, नकली दही बनाने का बड़ा कारोबार सामने आया। जिसमें ‘‘विषबाण’’ टीम द्वारा नकली मावा बनाने की विधि को भी कैमरे में कैद किया गया। नकली मावा ;खोआद्ध निर्माण में जुटे मजदूर ने बताया कि मावा निर्माण में दिल्ली से आये माधव ब्रांड के पाउडर जिसका 25 थैली ;25 किलोद्ध का बोरा 4000 हजार की दर से खरीद कर 50 किलो खोआ का निर्माण किया जाता है जिसमें चिकनाई के लिये 5 किलो नकली मावा में 1 लीटर रिफाइंड का प्रयोग किया जाता है। जिससे नकली मावा की लागत 100 रूपये प्रति किलो आती है। जिसकी बिक्री 160-180 रूपये प्रति किलो की दर से बाजार में होती है। नकली मावा निर्माण करने वाले माफियाओं की मानें तो नकली मावा की सप्लाई दिल्ली, आगरा, नोयडा, भरतपुर, वृन्दावन, मथुरा, हाथरस, अलीगढ़ सहित जनपद के प्रत्येक कस्बे में होती है। जिसका प्रयोग बड़े पैमाने पर मिठाई में होता है। बताते हैं कि रक्षाबंधन के पर्व पर ही एक हजार टन से अधिक नकली मावा का निर्माण कर घेवर में प्रयोग किया गया। जबकि कृष्ण जन्माष्टमी पर्व पर ही नकली मावा निर्माण का कार्य बड़े पैमाने पर हो रहा है। जिसे वृन्दावन- मथुरा की मण्डी में बिक्री कर श्र(ालुओं-भक्तों को परोसने की तैयारी है। जबकि राया क्षेत्र के ही सोनई कस्बा में नकली सरसों तेल का निर्माण कर
धड़ल्ले से बेचा जा रहा है। जिसके खाते ही जनता गंभीर बीमारियों का शिकार हो रही है। इसी तरह फरह, चौमुंहा, छाता, नन्दगांव, गोवर्धन, शेरगढ़ क्षेत्र में भी बड़े पैमाने पर नकली दूध, घी, पनीर, मावा बनाने का कारोबार सामने आया। जांच-पड़ताल में हर जगह सामने आया कि काले कारोबार से अफसर-पुलिस मालामाल हो रहे थे तो नकली खाद्य पदार्थों से जनता बेहाल हो रही थी और सख्त कानून बेअसर नजर आ रहा था।

हर डाल पर उल्लू बैठा है, अंजाम-ए-गुलिस्तां…

मथुरा। ‘‘हर डाल पर उल्लू बैठा है, अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा’’ की पंक्तियां खाद्य विभाग एवं मिलावट खोर माफियाओं के गठजोड़ पर सटीक साबित हो रही हैं। पग-पग पर मिलावट खोर नजर आ रहे हैं तो वहीं उन्हें संरक्षण प्रदान करने वाले खाद्य, पुलिस, प्रशासन के अधिकारी अपनी जेबें भरने में लगे हुए हैं।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बनाया जा रहा सख्त खाद्य सुरक्षा कानून अफसरों के लिये मुफीद साबित हो रहा है। जहां मिलावट खोरी रोकने के लिये सैम्पलिंग भरने का अभियान अफसरों को मालामाल कर रहा है। जिसमें सैम्पिल को फेल-पास से लेकर उसे रफा-दफा करने के नाम पर प्रतिमाह लाखों करोड़ों का खेल खेला जा रहा है।
शासन द्वारा खाद्य वस्तुओं में मिलावट खोरी रोकने के लिये खाद्य एवं सुरक्षा अभिहीत अधिकारी चन्दन पाण्डेय सहित करीब एक दर्जन निरीक्षकों की फौज है जिनके द्वारा आये दिन खाद्य वस्तुओं का निरीक्षण कर सैम्पलिंग की जाती है। जिन्हें परीक्षण के लिये लखनऊ सहित अन्य स्थानों पर भेजा जाता है। लेकिन निरीक्षकों द्वारा लिये गये सैम्पिल मथुरा कार्यालय आते ही बड़े पैमाने पर लोप हो जाते हैं। सूत्रों का कहना है कि अधिकारियों द्वारा केवल उन्हीं ठिकानों को निशाने पर लिया जाता है जहां से उन्हें वार्षिक सुविधा शुल्क नहीं मिलता है अथवा ऐसी वस्तु का नमूना लिया जाता है जिसके पास होने या फिर कम्पनी की जिम्मेदारी तय होती है। सूत्र बताते हैं कि नमूना लेने के बाद कोराबारी-अधिकारियों के मध्य आंख-मिचौली का खेल शुरू होता है। जिसमें कशमकश के बाद मोटा लेन-देन कर जिला मुख्यालय पर नमूने को परीक्षण को भेजने के स्थान पर नष्ट कर दिया जाता है। जिनकी सैटिंग का खेल जिला मुख्यालय पर नहीं बनता है वह दलालों के माध्यम से लैब पहुंचकर पास कराने में सफल हो जाते हैं। बताया जाता है कि दीपावली, रक्षाबंधन, होली, कृष्ण जन्माष्टमी आदि पर्वों पर बड़े पैमाने पर खाद्य विभाग निरीक्षक मिठाई, दूध, दही, नमकीन, तेल, मावा, मसाले आदि के हजारों सैम्पिल लेते हैं लेकिन परीक्षण की रिपोर्ट में सैकड़ों में भी उपलब्ध नहीं हैं। जबकि समाचार पत्रों में आये दिन नमूने लेने की खबरें छपती रहती हैं। लेकिन विभाग के रिकॉर्ड में उनका रिकॉर्ड कहीं नजर नहीं आता है।
‘‘विषबाण’’ की टीम ने कई मामलों की गहराई से जांच पड़ताल की तो कृष्णा नगर के एक सौंस निर्माता से सैम्पिल के नाम पर पहले एक लाख की वसूली की गई उसके बाद 2 लाख की और मांग की गई। जिसमें एक राजनैतिक नेता के हस्तक्षेप से मामला-रफा-दफा हो सका। दूसरा मामला मांट क्षेत्र के मिठाई विक्रेता का है जहां नमूना लेने के बाद मिष्ठान विक्रेता से 40 हजार की वसूली की गई। इसी तरह चौमुंहा क्षेत्र के मिष्ठान विक्रेता का सैम्पिल लेने के बाद 60 हजार में मामला रफा-दफा कर नमूने को नष्ट किया गया। कस्बा नौहझील की एक पनीर डेयरी से लिये गये नमूने को पास कराने के बदले भी मोटा खेल किया गया। सूत्र बताते हैं कि सिंथैटिक दूध का कारोबार करने वाले दूधियों से प्रतिवर्ष के हिसाब से 5 हजार प्रति दूधिया से वसूली की जाती है। इस वसूली में डेयरी संचालक बिचौलिये मुख्य भूमिका अदा करते हैं। इसी तरह व्यापार से जुड़े कथित व्यापारी नेता छोटे-छोटे दुकानदारों से वार्षिक वसूली कर खाद्य विभाग के निरीक्षकों से मध्यस्था की भूमिका निभाते हैं। जिससे मिलावट का खेल सख्त कानून के बाद भी थमने के स्थान पर लगातार बढ़ता जा रहा है। और यह कानून खाद्य विभाग के अफसरों के लिये वरदान साबित हो रहा है।

मिठाई के साथ बिक रहा है धड़ल्ले से सिंथैटिक मावा

मथुरा। ‘‘मासूम मरे या जवान, हमें तो दौलत से काम’’ की कहावत मिलावट खोरों एवं खाद्य विभाग के अधिकारियों पर सटीक साबित हो रही हैं जहां सबसे ज्यादा मिष्ठान की दुकानों पर मिलावट खोरी होने के बावजूद भी किसी भी अधिकारी को मिलावट नजर नहीं आ रही है।
जनपद में खुलेआम मिष्ठान विक्रेता आम जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने में लगे हैं। रक्षाबंधन, दीपावली, भैयादूज का पर्व हो या फिर शादी का मौसम पाउडर-रिफाइंड से निर्मित मावा का प्रयोग तो खुलकर करते ही हैं। बल्कि मावा के रूप में ब्रेड, गरीबों के राशन में आने वाले चावल की किनकी (टूटे हुए चावल) का भरपूर प्रयोग किया जाता है। सूत्रों का कहना है कि पूर्व में दीपावली के पर्व पर प्रमुख मिष्ठान विक्रेता के यहां जाते हुए खाद्य विभाग के अधिकारियों ने नकली मावा से सैकड़ों कुंतल से भरी मैटाडोर को पकड़ा था जिसे दो लाख के लेन-देन के बाद छोड़ा गया। जबकि इसी मिष्ठान विक्रेता के गोदाम पर छापा मारने की रणनीति को अंजाम दिया जाना था। तभी इसकी जानकारी मिष्ठान विक्रेता को होने पर आनन-फानन में हजारों पैकिट ब्रेड तथा उससे निर्मित की गई मिठाई को यमुना नदी में बहा दिया गया जिससे विभागीय अधिकारी हाथ मलते रह गये थे। सूत्र बताते हैं कि हर त्योहार पर हजारों टन मिठाई की खपत होती है। जिसमें प्रयोग होने वाले मावा की पूर्ति दूध से होना किसी भी प्रकार से संभव नहीं है। लेकिन इसके बावजूद भी धड़ल्ले से मावा निर्मित मिठाई की बिक्री बड़े महानगरों से लेकर छोटे-छोटे गांव-कस्बों तक होती रहती है। लेकिन यह किसी अधिकारी को नजर नहीं आती है।

30 रु. किलो घर-घर बिकता नकली दही

मथुरा। माफिया आम जनता के स्वास्थ के साथ किस तरह खिलावाड़ कर रहे हैं इसका खुलासा हलवाईयों एवं चार विव्रळेताओं द्वारा प्रयोग किये जाने वाले दही में सामने आया। जहां बाइक-मोपेड पर गौसना आदि के दर्जनों लोग मात्र 30 रूपये प्रति किलो की दर पर दही की बिव्रळी शहरी क्षेत्र में करते हैं। जबकि दूध की बिव्रळी ही 45 से 50 रुपये प्रति लीटर पर हो रही है।
‘‘विषबाण’’ की टीम ने 30 रुपये प्रतिकिलो की दर पर दही बेचने वाले मोपेड सवार का पीछा किया तो वह कैमरे को देखकर भागने लगा। इस पर उसे विश्वास में लेते हुए जानकारी की तो बताया कि वह अरारोट और व्रळीम खिचे हुए दूध से दही बनाते हैं जो काफी सस्ता पड़ता है। जिसे वह 30 से 35 रूपये किलो पर चाट एवं मिष्ठान विव्रळेताओं को बेचते हैं। जबकि जानकार सूत्रों का कहना है कि कैमीकल एवं पाउडर को मिलाकर दही का निर्माण हो रहा है जिसकी लागत 6-7 रूपये प्रति किलो तक आती है। इसकी जानकारी पुलिस से लेकर खाद्य विभाग के अफसरों तक होने के बाबजूद भी सब खामोश हैं।

दोषियों को बख्सा नहीं जायेगा -डीओ

खाद्य एवं सुरक्षा अभिहीत अधिकारी (डीओ) चन्दन पाण्डेय मथुरा

मथुरा। जनपद में बड़े पैमाने पर मिलावटखोरों एवं नकली खाद्य वस्तुओं के निर्माण पर खाद्य विभाग के मुख्य
अधिकारी ने किसी भी प्रकार के संरक्षण एवं अवैध वसूली को निराधार बताते हुए दोषियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही करने की चेतावनी दी है।
खाद्य एवं सुरक्षा अभिहीत अधिकारी (डीओ) चन्दन पाण्डेय से ‘‘विषबाण’’ द्वारा नकली पनीर, घी, मावा निर्माण के सम्बंध में जानकारी की तो उनका कहना था कि बाजना पनीर निर्माण की सबसे बड़ी मण्डी है जहां पिछले दिनों ज्वाइंट मजिस्ट्रेट द्वारा निरीक्षण किया गया तथा पनीर डेयरी संचालकों को प्रशिक्षण भी दिया गया था। उन्होंने नकली/ मिलावटी पनीर-घी निर्माण की किसी घटना-अवैध वसूली को निराधार बताते हुए दावा किया कि परीक्षण के लिये गये नमूनों से कोई समझौता नहीं किया जाता है तथा सभी नमूनों को परीक्षण के लिये लैब भेजा जाता है। उन्होंने कहा कि अगर कहीं भी मिलावट पाई जाती है तो दोषियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जायेगी। श्री पाण्डेय ने भ्रष्टाचार के सभी आरोपों को गलत करार देते हुए कहा कि मिलावट एवं नकली वस्तुओं का निर्माण करने वालों को किसी भी कीमत पर छोड़ा नहीं जायेगा।