क्रांतिकारी संत तरूण सागर का निधन, विषबाण के साथ जुड़ी हैं पुरानी यादें

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1 दिसम्बर 2015 को तीन दिवसीय (3 से 6 दिसम्बर 2015) कड़वे प्रवचन कार्यक्रम में आये तरूण सागर जैनमुनि को ‘विषबाण’ समाचार पत्र की प्रति प्रदान करते सम्पादक मफतलाल अग्रवाल एवं समाचार पत्र का अध्यन करते स्व. तरूण सागर महाराज (file photo)

नई दिल्ली. जैन मुनि तरुण सागर का शनिवार को सुबह निधन हो गया। 51 वर्षीय जैन मुनि लंबे समय से बीमार चल रहे थे। पूर्वी दिल्ली के कृष्णा नगर इलाके में स्थित राधापुरी जैन मंदिर में सुबह करीब 3 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। शनिवार को ही गाजियाबाद के मुरादनगर स्थित तरुणसागरम में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।

दिगंबर जैन मुनि को उनके प्रवचनों के लिए जाना जाता है। ‘कड़वे प्रवचन’ के नाम से समाज को वह संदेश देते थे। वह समाज और राष्ट्र जीवन के अहम मुद्दों पर तीखी शब्दों में अपनी राय दिया करते थे। जैन समाज में खासे लोकप्रिय रहे तरुण सागर बीते काफी दिनों से पीलिया से पीड़ित थे। करीब 20 दिनों पहले उन्हें इलाज के लिए एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इलाज के बावजूद स्वास्थ्य में सुधार न होने पर उन्होंने अपना इलाज बंद करा लिया था।

कुछ दिनों से वह राधापुरी जैन मंदिर में ही संथारा कर रहे थे। संथारा जैन धर्म की वह परंपरा है, जिसके तहत संत मृत्यु तक अन्न त्याग कर देते हैं। मध्य प्रदेश में 1967 में जन्मे तरुण सागर महाराज का वास्तविक नाम पवन कुमार जैन था। जैन संत बनने के लिए उन्होंने 8 मार्च, 1981 को घर छोड़ दिया था। उन्हें हरियाणा विधानसभा में भी प्रवचन के लिए बुलाया गया था।

मुनि तरुण सागर की सल्लेखना शुरू होने की जानकारी लगते ही उनके गृहस्थ जीवन के रिश्तेदार और भक्तों का दिल्ली पहुंचना शुरू हो गया है। दमोह जिले के गुंहची गांव में उनका घर है। जहां से अधिकांश परिजन दिल्ली पहुंच चुके है। इसके अलावा तेंदूखेड़ा में उनके गृहस्थ जीवन की बड़ी बहन माया जैन रहती है। जिनके घर से भी परिजन दिल्ली पहुंच चुके है। माया जैन से पत्रिका प्रतिनिधि ने चर्चा की। इस दौरान उन्होंने बताया कि वह चार भाई और तीन बहनें है। जिनमें से एक तरुणसागर भी है।

माया जैन ने बताया कि तरुणसागर बचपन से ही धार्मिक रहे है। शरारत के साथ-साथ धर्म में उनका लगाव रहा है। वह भगवान बनना चाहते थे। यही कारण था कि १२ वर्ष की उम्र में ही उन्होंने घर का त्याग कर आचार्यों के साथ रहने लगे थे। आचार्य विद्यासागर से ब्रह्मचर्य की दीक्षा लेने के बाद वह वापस पीछे नहीं मुड़े और २० साल की उम्र में ही वह मुनि तरुणसागर बन गए। उन्हें आचार्य पुष्पदंग सागर ने मुनि दीक्षा दी। इसके बाद वह जो है सभी के सामने है। तब से वह हमारे नहीं जनसंत बन चुके थे। मुनि तरुणसागर की सल्लेखना की खबर अचानक सुनकर पूरा परिवार स्तब्ध है।

बहन माया जैन के अनुसार तरुण सागर घर से यह कहते हुए निकले थे कि वह भगवान बनना चाहते है, वह महावीर बनना चाहते है। आज समाधि भावना के साथ ही उनकी यह बात भी सच हो रही है। समाधि मरण की मोक्ष का रास्ता है। जो हर किसी को नहीं मिलता। भगवान महावीर के आदर्शों पर चलते हुए मुनि तरुणसागर ने समाज को नई दिशा दिखाने का कार्य है जो युगो-युगो तक याद किया जाएगा।