70 करोड़ के बकायेदार मथुरा के बिल्डर

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मथुरा‘‘ऊँची दुकान फीका पकवान’’ की कहावत मथुरा-वृन्दावन विकास प्राधिकरण-बिल्डरों के गठजोड़ पर सटीक साबित हो रही है। जहां गगन चुम्बी इमारतों की नीव खड़ी करने वाले बड़े-बड़े बिल्डर विकास प्राधिकरण के अफसरों की मेहरबानी के चलते 70 करोड़ से अधिक के बकायेदार होने के बाबजूद भी रहीसी जीवन जी रहे हैं लेकिन प्राधिकरण में वह अपनी कंगाली दर्शा रहे हैं।
मथुरा-वृन्दावन विकास प्राधिकरण विकास की कसौटी पर भले ही जनता के लिये वरदान साबित ना हो रहा हो लेकिन विकास प्राधिकरण के अफसरों, कर्मचारियों के लिये भूमाफिया-बिल्डर सोने का अण्डा लेने वाली मुर्गी साबित हो रहे हैं। सामान्य जनता पर मामूली बकाया राशि पर कानून का डण्डा चलाने वाले अफसर 70 करोड़ से अधिक की राशि के बकाया बड़े अफसरों पर आँखें बूँदे हुए हैं बल्कि उन पर बकाया राशि की जानकारी देने से भी बार-बार अपना मुँह फेर रहे हैं। विकास प्राधिकरण की वेबसाइट पर 31 मार्च 2015 तक बाह्य विकास शुल्क के रूप में दो दर्जन करीब प्रमुख बिल्डरों पर 45 करोड़ से अधिक की बकाया राशि प्रदर्शित की गई है। तीन साल से अधिक समय बाद भी किसने कर्ज चुकाया है किसने नहीं यह विकास प्राधिकरण का कोई अफसर बताने को तैयार नहीं है। विकास प्राधिकरण की वेबसाइट के मुताबिक मथुरा के सबसे बड़े बिल्डर श्रीग्रुप के संदीप अग्रवाल जिनका कारोबार मथुरा से लेकर नोयडा तक फैला हुआ है, जिनके राधावैली, राधापुरम स्टेट, राधा सिटी सहित डेढ़ दर्जन से अधिक प्रोजेक्ट संचालित हैं उन पर 13 करोड़ 60 लाख से अधिक का बाह्य विकास शुल्क बकाया होने के साथ सबसे टॉप पर हैं।
बकाया सूची में दूसरे नम्बर पर बसेरा ग्रुप वृन्दावन के रामकिशन अग्रवाल पर 2 करोड़ 87 लाख, तीसरे पर हाईव्यू कंस्ट्रक्शन प्रा.लि. पर 2 करोड़ 70 लाख, चौथे पर अरविन्द्र कुमार अग्रवाल लाजपत नगर पर 2 करोड़ 42 लाख, पाँचवे पर मयंक अग्रवाल (पुष्पांजलि ग्रुप आदि) पर 2 करोड़ 23 लाख से अधिक बकाया है। इसी तरह वीरेन्द्र सिंह (आनन्द नगर) पर 1 करोड़ 28 लाख, देवीदास गर्ग (नरसी बिहार) पर 1 करोड़ 29 लाख, राकेश मिश्रा (आनन्द वन आदि) पर 1 करोड़ 83 लाख, देवेन्द्र शाह (निधिवन हाईट्स आदि) पर 1 करोड़ 54 लाख, दीपक गुप्ता (हाईटेक ग्रुप हाऊसिंग) पर 1 करोड़ 28 लाख, अशोक गोयल (श्री जी शिवाशा एस्टेट आदि) 98 लाख 54 हजार, अंकुर मित्तल (नरसी विलेज आदि) पर 82 लाख 76 हजार, जितेन्द्र सिंह (प्रगति कुंज आदि) पर 46 लाख 65 हजार, अशोक बिन्दल (माया एन्कलेव) पर 77 लाख 64 हजार, कपिल देव (ग्रुप हाउसिंह आदि) पर 58 लाख 87 हजार, आर.सी. गोयल (ग्रुप हाउसिंग) पर 58 लाख 32 हजार, अशोक लाटा (तरंग डिवाइन सिटी फेस-2) 41 लाख 86 हजार, उमेश चन्द माहेश्वरी (माहेश्वरी हॉस्पीटल) पर 28 लाख 79 हजार, एस.पी.बजाज (सौर्य हाऊसिंग) पर 76 लाख 54 हजार, रामकिशोर अग्रवाल (कॉलेज अकबरपुर) पर 40 लाख, प्रेसीडेंट पैलेस (होटल) 39 लाख, माधवदास (रेन बसेरा एवं भोजनालय) पर 37 लाख 48 हजार, विनोद शर्मा (ग्रुप हाउसिंग) 36 लाख 87 हजार, बाबूलाल आदि पर 36 लाख, हरेन्द्र प्रताप सिंह (महाराज स्टेट) पर 34 लाख, राजकुमार (भक्ति कुंज कॉलोनी) पर 33 लाख, नीरज कुमार गोयल (कल्पतरू रेजीडेन्सी) 28 लाख, शशांक गर्ग (गार्डन हाईट्स) 26 लाख, कैलादेवी (स्कूल, तेहरा) पर 25 लाख, मुकेश अग्रवाल (जगन्नाथ पुरम बाद) पर 24 लाख, शैली शाह (राधिका सिटी महौली) 23 लाख, विनोद कुमार (कॉलेज, भरतपुर रोड़) पर 19 लाख 90 हजार, बलवीर सिंह बंसल (इन्द्रपस्थ कॉलोनी, मथुरा) पर 19 लाख, राकेश कुमार गर्ग (नरसी बिहार फेस-1, पालीखेड़ा) 19 लाख, जयदीप तिवारी (गोपनन्दा, तेहरा) पर 16 लाख 40 हजार, प्रवीन कुमार अग्रवाल (औद्योगिक कोसी) पर 15 लाख 60 हजार, सुरेश कौशिक (राधा आर्चेट जयसिंहपुरा) पर 15 लाख, अनिल कुमार अग्रवाल (काना माखन वाटिका) पर 14 लाख, मनोज अग्रवाल नवादा पर 12 लाख, हरि मोहन गुप्ता (हरेकृष्णा धाम, जैत) 12 लाख, मैगसन्स होटल प्रा.लि. (मैगसन्स अर्पाटमेल्ट, कोसी) 12 लाख, प्रदीप कुमार अग्रवाल (पुष्पांजलि बैकुण्ठ सेक्टर-4, तेहरा) पर 12 लाख, प्रवीन चतुर्वेदी (वृन्दा हाईट्स, वृन्दावन) पर 11 लाख, विशाखा गोयल (ग्रुप हाउसिंग) पर 10 लाख, सुनीता अग्रवाल (श्री कृष्णा व्यास) पर 10 लाख, वेद प्रकाश मंगला (ग्रुप हाउसिंग) पर 10 लाख, निरूपम दयाल (मधुवन वाटिका) पर 10 लाख, रामभरोसे आदि (पिंक सिटी, नवादा) पर 9 लाख, तेजवीर सिंह (मधु इन्कलेव, पालीखेड़ा) पर 8 लाख, विवेक चावला (कृष्णा फ्लोरेंस, जैंत) पर 8 लाख, विनोद अग्रवाल (टेकमेन सिटी-5, नवादा) पर 8 लाख, रामजी लाल (श्री राधाकृष्ण धाम, कोसी) पर 8 लाख, मुकेश अग्रवाल (कॉलेज, छाता) पर 6 लाख, महेश शर्मा (वृन्दावन कॉलोनी, तंतूरा) पर 6 लाख, शेखर एवं अतुर गोयल (मधुवन विहार, महौली) पर 5 लाख, बालकिशन गुप्ता (रामा हाईटस) पर 5 लाख, प्रभावत अग्रवाल (गोपाल धाम) पर 5 लाख, गोपीराम यादव (गोपीधाम) पर 5 लाख आदि की राशि बाह्य विकास शुल्क के रूप में बकाया है। जानकारी सूत्र बताते हैं 31 मार्च 2015 तक 45 करोड़ से अधिक की बकाया राशि बढ़कर 70 करोड़ के करीब हो गई इस सम्बंध में ‘विषबाण’ टीम द्वारा जानकारी की गई तो सचिव रमेश चन्द से जानकारी करने के लिये कहा गया जब टीम ने सचिव से सम्पर्क किया तो उन्होंने कहा कि वह तो अभी नए आये हैं उन्हें कोई जानकारी नहीं है और उन्होंने चीफ इंजीनियर अजीत प्रताप सिंह से जानकारी लेने के लिए कहा जब चीफ इंजीनियर से मुलाकात की तो उन्होंने पहले तो कोई जानकारी देने से इंकार किया इसके बाद उन्होंने शाम को आने के लिए कहा जब पुनः सम्पर्क स्थापित किया तो वह आवश्यक मीटिंग में जाने की कहकर कार्यालय से बाहर निकल लिये। इसके बाद दूसरे दिन पुनः मुलाकात की तो उन्होंने कहा कि उनके पास बकाया सूची की कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। इस सम्बन्ध में कोई भी अधिकारी कर्मचारी अधिकारिक रूप से जानकारी देने को तैयार नहीं हुआ। जबकि विभागीय सूत्रों का कहना है कि बकाया दारों पर कभी-कभी नोटिस निकालकर खानापूरी कर दी जाती है। बताते हैं कि बकाया शुल्क होने पर नये प्रोजेक्टों को स्वीकृति प्रदान नहीं की जा सकती है लेकिन काली कमाई के खेल ने सभी नियम-कानूनों को ताक पर रखकर ना तो बकाया दारों के प्रोजेक्टों को निरस्त किया जा रहा है और ना ही उनके खिलाफ वसूली के लिये सख्त कार्यवाही की जा रही है। जिससे ‘दामोदर बैठे रहें, दाम करे सब काम’ की कहावत विकास प्राधिकरण के अफसरों पर सटीक साबित हुई है।

विकास प्राधिकरण में बहती है भ्रष्टाचार की गंगा

मथुरा। विकास की पटकथा लिखने वाला मथुरा-वृन्दावन विकास प्राधिकरण भ्रष्टाचार की नित नई कहानियां रटने में लगा है। प्राधिकरण की सीमा में हाने वाले अवैध निर्माण एवं अवैध कॉलोनियां अफसरों के लिये कुबेर का खजाना साबित हो रहे हैं। जिसे दोनों हाथों से लूटने का खेल खुलकर खेला जा रहा है। लेकिन राजनेता एवं अफसर इस खुली लूट को देखकर आंख मूंद कर सरकार की तपस्या में लीन नजर आ रहे हैं।
उ.प्र. में ‘‘ना भ्रष्टाचार, ना गुण्डाराज’’ के नारे के साथ भारी बहुमत से सरकार में योगी सरकार के दावे भगवान योगीराज की कृष्ण की नगरी में हवा-हवाई साबित हो रहे हैं। मथुरा-वृन्दावन विकास प्राधिकरण के तमाम अफसर-कर्मचारी सरकार बदलते ही बदल गये। लेकिन भृष्टाचार में दूर-दूर तक परिवर्तन नजर नहीं आ रहा है। प्राधिकरण की सीमा में अवैध रूप से बननी वाली बड़ी-बड़ी बिल्डरों अफसरों के लिये वरदान साबित हो रही है। आये दिन प्राधिकरण के अफसर अवैध निर्माण के नाम पर भवनों को सील करते हैं लेकिन चन्द दिनों बाद ही उनका निर्माण पूर्ण होकर वहां कारोबार शुरू हो जाता है। इसके बाद प्राधिकरण की टीम नये शिकार की तलाश में जुट जाती है। जैसे ही धन रूपी चारा डाला जाता है वैसे ही सब ठीक है का नारा लग जाता है।