जवाहर बाग कांड: कहाँ गये 27 लापता

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जवाहरबाग में रामवृक्ष यादव का साक्षात्कार करते ‘‘विषबाण’’ के सम्पादक मफताल अग्रवाल (फाइल फोटो)

मथुरा। दो पुलिस अधिकारियों सहित 29 लोगों की मौत और कई मासूमों सहित 27 लापता लोगों की गवाह बना मथुरा का जवाहर बाग आज भी दो साल बाद अपनी खूनी कहानी-वीरानी और दुर्दशा बयां कर रहा है। जले हुए पेड़, वीरान जंगल, लपटों की कहानी बता रहे हैं कि दो साल पूर्व की खुशियां आज तक नहीं लौटी हैं तो वहीं दूसरी तरफ मथुरा सहित यूपी की आधा दर्जन से अधिक जेलों में 97 सत्याग्रही न्याय पाने के लिये दो साल से कानून की लड़ाई लड़ रहे हैं तो कई दर्जन आंदोलन कारी जेलों की तन्हाई में अपने दिन गिन रहे हैं जबकि हिंसा के जनक कहे जाने वाले रामवृक्ष यादव को शासन-प्रशासन आजतक भी मृत साबित नहीं कर पा रहा है। जिसे जिंदा या मृत घोषित करने को लेकर उसके परिजन मथुरा से लेकर हाईकोर्ट तक न्याय की जंग लड़ रहे हैं। जबकि एक साल बाद भी सीबीआई जांच की अंतिम फाइल अभी तक न्यायालय में दाखिल नहीं हो सकी है। आज भी जवाहर बाग में धूं-धूं कर जले वाहन और पेड़ घटना की कहानी आज भी रो-रो कर बता रहे हैं।

फाइल फोटो

जवाहर बाग मथुरा की घटना के लिये भले ही रामवृक्ष यादव या उसके संगठन को जवाहर बाग पर कब्जा करने की कहानी को जिम्मेदार माना जा रहा हो लेकिन सच तो यह है कि ‘‘कलयुग में सतयुग आयेगा’’ अपने भक्तों को सतयुग का स्वप्न दिखाने वाले ब्रह्मलीन बाबा जयगुरूदेव की यह भविष्यवाणी उनके जीते जी भले ही सच साबित न हुई हो लेकिन हजारों करोड़ की सम्पदा को लेकर उनके भक्तों पर कलयुग का असर साफ नजर आ रहा है। जहां एक तरफ उनके 27 अनुयाई ‘‘जवाहर बाग’’ की लपटों की भैंट चढ़ गये। वहीं बनारस के रामघाट पर भी दो दर्जन से अधिक भक्त प्रतिष्ठा की जंग में बलि चढ़ गये। इसके अलावा जय गुरूदेव मंदिर के पीछे बन रहे बाबा के समाधि स्थल के निर्माण पर हाईकोर्ट की रोक के बाद आज भी सड़क से लेकर न्यायालय तक जग छिड़ हुई है। बाबा के उत्तराधिकार और हजारों करोड़ की चल-अचल सम्पत्ति पर कब्जा जमाने की जंग जयगुरूदेव के निधन के साथ ही शुरू हो गई थी जिसमें उनके अनुयाइयों ने उनकी मौत और बाॅडी पर ही प्रश्न चिन्ह् लगाते हुए हंगामा किया था। जिसकी लपटें जवाहरबाग तक पहुंच गई। रामवृक्ष यादव ने बाबा जयगुरूदेव की मृत्यु का प्रमाण पत्र के नाम पर जवाहरबाग में हजारों भक्तों के साथ धरना शुरू किया गया था। लेकिन रामवृक्ष हिटलरशाही के चलते जहां संगठन दो-फाड़ हो गया बल्कि दो जून की खूनी हिंसा का अंजाम भी रामृवक्ष के साथ ही हजारों समर्थकों को भुगतना पड़ा था। जिसमें दो साल से अधिक समय तक जवाहरबाग पर कब्जा जमाये बैठे सत्याग्रहियों से उसे खाली कराने के दौरान हिंसा भड़की थी। जिसमें दो पुलिस अधिकारियों सहित 27 कथित सत्याग्रहियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था।

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घटना की पृष्ठ भूमि की ओर चलें तो 11 जनवरी 2014 को मध्यप्रदेश के सागर जनपद से स्वाधीन विधिक सत्याग्रह संगठन के बैनर तले हजारों सत्याग्रही विभिन्न राज्यों की यात्रा के बाद 15 मार्च 2014 को मथुरा के जवाहरबाग पहुंचे जहां दो दिवसीय सत्याग्रह को अनुमति के नाम पर लम्बे समय तक अपनी तथा-कथित मांगों को लेकर जम गये। जिसमें भारतीय मुद्रा को ब्रिटिश करेंसी बताकर आजाद हिंद बैंक की करेंसी लागू करने, एक रूपये के बदले 60 लीटर डीजल, 40 लीटर पैट्रोल, एक तोला सोना, बाबा जयगुरूदेव को बंधक बनाकर अपहरण करने, उनका मृत्यु प्रमाण पत्र उपलब्ध कराने, बैंकों की कर्जा माफी जैसी मांगें प्रमुख रूप से शामिल थीं। जिन्हें मथुरा प्रशासन अपने से बाहर का बताकर पल्ला झाड़ते हुए नोटिस दर नोटिस और एफआईआर दर्ज कराने क1ा खेल खेलता रहा।

फाइल फोटो

कथित सत्याग्रह के प्रणेता रामवृक्ष यादव की मांगों को सुनकर जहां प्रशासन हर बार पीछे हटता दिखाई देता था बल्कि यादव की हिटलरशाही आवाज को सुनकर कांप उठता था। एक बार प्रशासन ने सख्त तेवर दिखाये तो समर्थकों ने जवाहर बाग का गेट बंद कर प्रशासन को बंधक बना लिया जिससे अफसरों के पसीने छूट गये थे। ‘‘विषबाण’’ की ओर से जब-जब रामवृक्ष यादव का साक्षात्कार लिया गया तब-तब वह मीडिया, न्यायपालिका, प्रशासन, सरकारों को विदेशी बताते हुए ऊंची आवाज में सभी को खामोश रहने पर मजबूर कर देता था। जब भी कोई उसकी मांगों पर आपत्ति करता उन्हें ब्रिटिश एजेंट बताकर सबक सिखाने तक का अल्टीमेटम देता था। एक बार उसने मीडिया कर्मियों को बंधक बनाकर पथराव 1कराया जिसपर जैसे-तैसे मीडिया कर्मियों को जान बचाकर भागने पर मजबूर होना पड़ा। रामवृक्ष की ताकत और तानाशाही रवैये का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि तत्कालीन सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव, उनके भाई शिवपाल यादव, पुत्र एवं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, जय गुरूदेव के कथित उत्तराधिकारी पंकज यादव, उमाकांत तिवारी, रामप्रताप सिंह के विरूद्ध थाना हाइवे में बाबा जयगुरूदेव का अपहरण कर बंधक बनाने, फर्जी कागजातों से जय गुरूदेव की 10 हजार करोड़ की सम्पत्ति हथियाने सहित अन्य संगीन आरोपों मंे मुकदमा दर्ज कराने की तहरीर दी जिसके दर्ज न होने पर मथुरा सीजीएम कोर्ट में 156(3) में मुकदमा दर्ज कराने की याचिका दायर की जिसकी सुनवाई के दौरान स्वयं रामवृक्ष यादव ने बहस की। जिसमें तानाशाही रवैया अपनाते हुए न्यायाधीश और वकीलों पर आपत्ति जनक टिप्पणी की तो वकीलों ने रामवृक्ष यादव और समर्थकों की धुनाई कर दी।

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राजनैतिक संरक्षण एवं समर्थकों की भीड़ का परिणाम था कि बाबा जयगुरूदेव के अपहरण एवं जिंदा होने के दावे पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने याचिका को निरस्त कर 25 हजार का जुर्माना लगाया था। लेकिन न्यायालय से लेकर शासन-प्रशासन उससे जुर्माने की राशि वसूलने में सफल नहीं हो सका। बल्कि शासन-प्रशासन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में भी याचिकाऐं दाखिल कर दीं थीं। जिसमें राम जेठमलानी जैसे देश के प्रमुख वकील उसकी पैरवी कर रहे थे। जब-जब रामवृक्ष यादव से प्रशासन एवं मीडिया ने वार्ता कीं तब-तब उसके समर्थकों ने वार्ता को कैमरे में कैद किया। जिसमें मीडिया एवं प्रशासन पर तानाशाही का रूप दिखाते हुए रामवृक्ष को जनता के बीच प्रस्तुत किया जाता। रामवृक्ष यादव की तानाशाही कार्यप्रणाली का ही परिणाम था कि संगठन में उसके दांये हाथ कहे जाने वाले पे्रम चन्द सिंह, दरोगा प्रसाद यादव, अजय रायकवार, वंश गोपाल पटेल, विनोद चैहान आदि द्वारा अक्टूबर 2014 में अलग होकर आजाद भारत संगठन की नींव खड़ी कर आंदोलन का ऐलान किया। जिसमें संगठन के दो फाड़ होने की खबर ‘‘विषबाण’’ में प्रकाशित होने पर रामवृक्ष ने हिटलरशाही अंदाजा में धमकाते हुए कहा-भारतीय मीडिया, नेता, प्रशासन, न्याय पालिका नपंुशक है सबसे पहले इनको ही देखा जायेगा।’’ यहीं नही रामवृक्ष का तम-तमाता चेहरा देखकर जब पत्रकार ने मुस्कराते हुए सवाल दागा कि आपके साथी आपको हिटलर मानते हैं और कहते हैं कि संगठन और समर्थकों को अपनी तानाशाही से तबाह कर देंगे तो रामवृक्ष ने चेतावनी देते हुए कहा कि ‘‘एैसे लोगों का नाम मेरे सामने लेने की जरूरत नहीं, नहीं तो इसके नतीजे गंभीर होंगे’’ इस तड़क-भड़क को उसके समर्थकों ने कैमरे में कैद किया गया।

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दो साल से अधिक समय तक सरकारी संरक्षण में जवाहरबाग पर कब्जा जमाने वाले रामवृक्ष यादव शासन-प्रशासन को चुनौती देते रहे जिस पर मथुरा बार एशोसियेशन के अध्यक्ष एड. विजयपाल सिंह तोमर की जनहित याचिका पर 20 मई 2015 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शासन-प्रशासन को जवाहर बाग खाली कराने के आदेश दिये। जिसमें रामवृक्ष और मथुरा प्रशासन के मध्य आंख-मिचैली का खेल 1 वर्ष से अधिक समय तक चलता रहा। उच्च न्यायालय की अवमानना कार्यवाही के खौफ के बाद प्रशासन ने 2 जून 2016 को जवाहर बाग को खाली कराया तो एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी, फरह थानाध्यक्ष संतोष यादव को बलिदान देना ही पड़ा बल्कि रामवृक्ष यादव भी करीब 27 समर्थकों के साथ आग की भेंट चढ़ गया। जवाहरबाग काण्ड की आग की लपटें चैबीस घण्टे बाद शांत भले ही हो गईं और पूरा बाग राख के ढेर में तब्दील हो गया हो लेकिन राख के ढे़र से उठ रही चीखों ने एक बार फिर शासन-प्रशासन को उस समय डरा दिया जब

विजयपाल सिंह तोमर
(पूर्व अध्यध बार एसोसिएशन)

विजयपाल सिंह तोमर सहित अन्य की जनहित याचिका पर 2 मार्च 2017 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीबी भौंसले एवं न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने जवाहर काण्ड की सीबीआई जांच कराने के आदेश दिये। इससे पूर्व प्रदेश सरकार द्वारा एक सदस्यीय न्यायिक जांच का गठन कर घटना की जांच कराई जा रही थी।
उच्च न्यायालय के आदेश के बाद सीबीआई अधिकारियों ने जांच-दर-जांच की लेकिन एक साल से अधिक समय के बाद भी आजतक जवाहरबाग की घटना का पूरा सच की अंतिम रिपोर्ट आजतक प्रस्तुति नहीं कर सकी है। जबकि जवाहरबाग की हिंसा में मासूमों सहित 27 लापता लोगों का दो साल बाद भी पता नहीं चल पा रहा है। वहीं रामवृक्ष यादव के पुत्र राजनारायण यादव ने ‘विषबाण’ से बातचीत में कहा की शासन-प्रशासन उनके पिता की मृत्यु का दावा तो कर रहा है। लकिन आजतक उनकी मृत्यु का प्रमाण पत्र जारी नहीं किया गया है। इसके लिए मथुरा नगरनिगम, सिटी-मजिस्ट्रेट कार्यालय में प्रमाण पत्र जारी करने के लिए आवेदन किया तो उनसे ही मृत्यु का प्रमाण मांगा गया। इससे परेशान होकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में मृत्यु प्रमाणपत्र जारी करने के लिए याचिका दायर की गई है। जिसमें न्यायालय द्वारा 4 सप्ताह का समय सरकार को जबाव दाखिल करने के लिए दिया गया है। रामवृक्ष के पुत्र कहते हैं ना तो मीडिया ने उनके साथ न्याय किया और ना ही शासन-प्रशासन सच पर ध्यान दे रहा है। राजनारायण यादव के वकील

एल.के. गौतम
(अधिवक्ता सत्याग्रही पक्ष)

एल.के. गौतम ने बताया कि अभी 97 सत्याग्रही मथुरा, आगरा, फतहपुर, अलीगढ़, नैनी आदि जेलों में बन्द हैं। जिन्हें न्याय दिलाने के लिए वह लगे हुए हैं। जवाहरबाग को खाली कराने एवं सीबीआई जांच कराने वाले बार के पूर्व अध्यक्ष विजयपाल सिंह तौमर ने ‘विषबाण’ से कहा कि जवाहरबाग के दोषियों को शीघ्र सजा मिलेगी। इसके लिए वह अपनी लड़ाई जारी रखेंगे। ‘विषबाण’ की टीम ने शुव्रळवार को जवाहरबाग का दौरा किया तो वहां हरियाली की जगह वीरानी की कहानी नजर आ रही थी और वहां पूरा सन्नाटा पसरा हुआ था। सीबीआई की जांच में जवाहर बाग की आग की आंच का सच क्या सामने आयेगा ये भविष्य के गर्भ में छिपा है। लेकिन अगर पूरी गहराई से इसकी जांच हुई तो सत्ताधारी नेता से लेकर छोटे-बड़े प्रशासनिक अफसरों के गले में तो कानून का फंदा होगा ही बल्कि रामवृक्ष की हिटलर शाही से बड़़ा प्रशासन की तानाशाही का दिल दहला देने वाले खौफनाक सच जवाहर बाग की खूनी लपटों से बाहर निकलकर आयेगा जो नकाब में छिपे कई चेहरों को झुलसाकर बदसूरत करेगा और सीबीआई की जांच का खौफनाक सच इतिहास की कई पीढ़ियों तक को डरायेगा। उच्च न्यायालय द्वारा सीबीआई को दो माह के अंदर जांच कर रिपोर्ट देने को कहा था। लेकिन एक साल बाद भी सीबीआई अपनी अंतिम रिपोर्ट उच्च न्यायालय में दाखिल नहीं कर सकी है। लेकिन समय चाहे कितना भी लगे ‘जवाहर बाग’ का खौफनाक सच जानने की लालसा हर व्यक्ति को है। 15 मार्च 2014 को ‘जवाहर बाग’ कब्जा के चार वर्ष बाद भी शासन-प्रशासन और कथित सत्याग्रहियों का दिन का चैन और रात की नींद उड़ी हुई है कि आखिर जवाहर बाग उनकी कब तक नींद उड़ाता रहेगा ?

रामवृक्ष के हिटलरशाही से काँपते थे अफसर-नेता, समर्थक और पत्रकार

मथुरा। जवाहर बाग की हिंसा के लिये भले ही रामवृक्ष यादव को जिम्मेदार माना जा रहा हो लेकिन इसके पीछे जय गुरूदेव की 10 हजार करोड़ की सम्पत्ति और यादव परिवार में छिड़ी दौलत हथियाने की जंग का खेल भी कम जिम्मेदार नहीं है। जिसने एक खूनी संग्राम को अंजाम दिलाया।
18 मई 2012 को बाबा जय गुरूदेव की मौत पर प्रश्न लगाकर रामवृक्ष यादव ने मुलायम, अखिलेश, शिवपाल यादव, पंकज यादव, उमाकांत तिवारी, रामप्रताप सिंह के खिलाफ बाबा को अपहरण कर 10 हजार करोड़ की सम्पत्ति हथियाने की रिपोर्ट थाने से लेकर न्यायालय तक में की लेकिन रिपोर्ट दर्ज नहीं हो सकी। भाजपा-बसपा नेता रामवृक्ष पर रामगोपाल यादव के संरक्षण का आरोप लगाते हैं जिसके कारण विद्युत काटने के बाद पुनः जुड़वाई गई बल्कि खाद्य आपूर्ति की सप्लाई भी नहीं रोकी गई। यही ही नहीं रामवृक्ष यादव सुप्रीम कोर्ट में मुलायम-शिवपाल के खिलाफ कानूनी जंग लड़ रहे थे जिसमें देश के नामी-गिरामी वकील जिनकी एक ही सुनवाई की फीस 15 से 25 लाख थी पैरवी करते थे। तो वहीं जवाहर बाग मंे हजारों लोगों को भोजन आदि सुविधा के नाम पर एक लाख रूपये प्रतिदिन दो वर्ष से अधिक समय से खर्च किये जा रहे थे। जबकि सत्याग्रह में भाग लेने वाले अधिकांश मजदूर वर्ग से थे।
चर्चा तो यह है कि बाबा जयगुरूदेव की हजारों करोड़ की सम्पत्ति के मुकाबले ही रामवृक्ष यादव ने जवाहर बाग की हजारों करोड़ की सम्पत्ति को कब्जाने का स्वप्न देखा था। जिसमें राजनैतिक आकाओं का भी स्वप्न पूरा होना था बल्कि भविष्य में जय गुरूदेव की विरासत को भी हथियाने का भी ख्वाब देखा था। लेकिन हाईकोर्ट के आदेश और सामाजिक लोगों की सक्रियता से रामवृक्ष यादव का किला रेत के महल की तरह ढ़ह गया। बल्कि उनके राजनैतिक चहेतों पर भी कानून का शिकंजा कसता नजर आ रहा है।
प्रस्तुति- मफतलाल अग्रवाल (सम्पादक ‘विषबाण’ मीडिया ग्रुप)