एक वो भी पत्रकार थे… एक ये भी पत्रकार हैं…

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30 मई को एक बार फिर पत्रकारिता दिवस की पूरे देश में धूम मची हुई है। जगह-जगह आयोजन आयोजित किये गये हैं जिनमें कहीं मंत्री, अफसर, नेता, वरिष्ठ पत्रकार पत्रकारों को मान मर्यादा, संस्कार, बहादुरी, इमानदारी की घुट्टी पिलाते दिखाई देंगे।
लेकिन इन आयोजनों में ही आपको पत्रकारिता की धज्जिायां उड़ती दिखाई देंगी। मंचों पर लुटेरे, डकैटों, बलात्कारियों, माफियाओं, भ्रष्ट नेता-अफसरों का गठजोड़ साफ झलकता नजर आयेगा। कोई पत्रकार संगठन का नेता किसी नेता-माफिया, अफसर की चरण वन्दना करता नजर आयेगा तो कोई उनकी जय-जयकार करता दिखाई देगा जो शालीन-सभ्य पत्रकार होगा वह खामोश-गुमसुम नजर आयेगा और जो दलाली की भूमिका में होगा वह उछलकूद करता नजर आयेगा। सबसे बड़ा सच तो यह है कि जहां-जहां एकल हाथ में कार्यक्रम होता है वहां तो शान्ति से निपट जाते हैं लेकिन जहां दूसरों के हाथों में कमान होगी वहां मौके पर जूतम-पैजार भी चलते नजर आयेंगे। लेकिन ये खबर आपको मीडिया में कहीं दिखाई नहीं देगी। कई बार पत्रकारिता दिवसों पर मेरा भी आना-जाना हुआ जहां मंचासीन भ्रष्ट-अफसर, माफिया, डकैट, नेता पत्रकारों को ही इमानदारी का पाठ पढ़ाते रहे और आयोजक -समर्थक तालियां पीटते रहे जैसे कि आज सबसे बड़ा बेइमान पत्रकार ही हो गया है। जब-जब इस गहराई में जाने का प्रयास किया तो मालूम हुआ कि कार्यक्रम की व्यवस्था ही मंचासीन लोगों से की गई। बल्कि खर्चे से ज्यादा रकम भी एकत्रित कर ली गई। जिसके कारण उन्हें पत्रकारों को गालियां देने का मौका मिल सका।
1857 की क्रांति से पहले पत्रकारों ने तोप से उड़ाना स्वीकार कर लिया जिसमें गदर के बाद अंग्रेजों की हुकूमत आने पर सबसे पहले अंग्रेजों के खिलाफ लिखने वाले पत्रकार मौलवी बाकर को तोप से उड़ाया गया। जिन्होंने अपनी जान तो दे दी लेकिन कलम पर आंच नहीं आने दी। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी, मौलाना आजाद, जवाहर लाल नेहरू जैसे राजनैतिज्ञों ने कलम के माध्यम से अपनी आवाज जनता तक पहुंचाई और देश को आजाद कराया। लेकिन देश के आजाद होने के साथ ही कलम-कलमकार भी रूप बदलता गया बल्कि इलैक्ट्रोनिक्स, सोशल मीडिया के रूप में मीडिया का रूप बदल गया। पत्रकार सरकार-माफियाओं, नेताओं, उद्योगपतियों के नजदीक होते गये और दरबारी-दलाली का कारोबार चल निकला। जिसका असर देश की राजधानी से लेकर गांव के गली मोहल्ले तक नजर आता है। अगर किसी गली-मोहल्ले में कोई सरकारी खरंजा-शौचालय बन रहा हो और उसमें गुणवत्ता से खिलवाड़ हो रहा है तो वहां दो-चार देहाती पत्रकार कलम-कैमरा लेकर पहंुच जायेंगे जिससे वह खबर की धमकी देकर दो-चार सौ या हजार दो-हजार ले जायेंगे। इसी तरह जगह-जगह राशन डीलरों को ये पत्रकार कलम-कैमरे को हथियार बनाकर लूटते नजर आयंेगे। ऐसे पत्रकार आपको थाने, चैकी, बिजली घर, तहसील अस्पताल सहित अन्य सरकारी कार्यालयों पर मंडराते नजर आयेंगे जैसे ही कोई पीड़ित-शोषित नजर आया उसे ही कब्जे में लेकर उसका शिकार कर लेते हैं।
इसी तरह के हालात छोटे शहरों से लेकर बड़े शहरों तक नजर आते हैं। जहां मीडिया के दलाल के रूप में बड़े-बड़े दलाल नजर आयेंगे जो संगठनों के पदाधिकारी के रूप में मंत्री-अफसर-नेता से नजदीकी दिखाकर लाखों-करोड़ों की दलाली के कारोबार को अंजाम देते हैं। जिसमें कुछ दिन पूर्व तक साइकिल-स्कूटर और सड़क पर अखबार बेचने वाले वह करोड़ों की कोठियों-कारों के मालिक बन गये। जिन्हें कभी दो वक्त की रोटी नसीब नहीं होती थी वह आज नेता-अफसरों को गाडियां-कोठियां और आलीशान होटलों में मंहगी दावतें देते नजर आ रहे हैं। शायद ‘‘पत्रकारिता दिवस’’ का असली मायना तो इन्हीं लोगों के लिये हो गया है वरना सच्चा पत्रकार तो अपनी दो वक्त की रोटी के लिये पहले भी तरस रहा था और आज भी तरस रहा है। ऐसे ही पत्रकारों से पत्रकारिता की गरिमा बनी हुई है। ऐसे पत्रकारों को सलाम और उन्हें पत्रकारिता दिवस की हार्दिक बधाई।

मफतलाल अग्रवाल
संपादक विषबाण मीडिया ग्रुप एवं सामाजिक कार्यकर्ता