जीवन के लिए अमूल्य धरोहर है ‘आयुर्वेद’

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आयुर्वेद कोई नया विषय नहीं है बल्कि ये भारत की हजारों साल पुरानी प्राचीन पद्धति है जिसका विशेष महत्व अब तक स्थापित नहीं किया गया था लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अलग विभाग बनाकर आयुर्वेद के महत्व का परिचय कराया है। इसी प्रकार प्रधानमंत्री ने योग को भी अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में पहचान दिलाकर सम्मान दिलाया। आयुर्वेद का भविष्य भी अतीत की तरह व्यापक है बस जरुरत है हमें और आपको आयुर्वेद को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाने की। 

आयुर्वेद प्राचीन भारतीय प्राकृतिक और समग्र वैदिक शास्त्र चिकित्सा पद्धति है। आयुर्वेद में आयुर का अर्थ है दीर्घ आयु और वेद का अर्थ होता है विज्ञान यानि आयुर्वेद का पूर्ण रुप से अर्थ है जीवन का विज्ञान। आयुर्वेद की शुरुआत वर्षों पहले भारत में हुई थी। आयुर्वेद का पूरा रहस्य भारत के इतिहास से जुडा हुआ है। आज विश्व भर की ज्यादातर आधुनिक और वैकल्पिक चिकित्सा आयुर्वेद से ली गयी है।
प्राचीन आयुर्वेद चिकित्सा की शुरुआत देवी-देवताओं के ग्रंथों से हुई और बाद में यह मानव चिकित्सा तक पहुंचा। सुश्रुत संहिता में साफ़-साफ लिखा गया है कि धनवंतरी ने किस प्रकार से वाराणसी के एक पौराणिक राजा के रूप में अवतार लिया और उसके बाद कुछ बुद्धिमान चिकित्सकों और खुद आचार्य सुश्रुत को भी दवाइयों के विषय में ज्ञान दिया। वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि आयुर्वेद के ज्ञान का उपयोग सिन्धु सभ्यता में भी पाया गया है साथ ही बौद्ध और जैन धर्म में भी इसकी कुछ अवधारणाओं और प्रथाओं को देखा गया है।
आयुर्वेद के उपचार में ज्यादातर हर्बल चीजों का उपयोग होता है। ग्रंथों के मुताबिक कुछ खनिज और धातु पदार्थ का भी उपयोग औषधि बनाने में किया जाता था। यहां तक की प्राचीन आयुर्वेद ग्रंथों से सर्जरी के कुछ तरीके भी सीखे गए हैं, जैसे नासिका संधान, पेरिनिअल लिथोटोमी, घावों की सिलाई आदि।

आयुर्वेद के मुताबिक मनुष्य के शरीर में तीन जैविक-तत्व होते हैं- वात यानि वायु तत्व, पित्त यानि अग्नि तत्व और कफ यानि जल तत्व। इन तीनों तत्वों को दोष या त्रिदोष कहा गया है। शरीर के भीतर इन तीनों तत्वों का उतार-चढ़ाव लगा रहता है और इन्हीं पर शरीर का स्वास्थ्य भी निर्भर करता है।
वात या वायु तत्व में सूखा, सर्दी, प्रकाश और चलने के गुणों की विशेषता होती है। वात के कारण पेट फूलना, गठिया, आर्थराइटिस जैसे बीमारियां आदि होती हैं।
पित्त या अग्नि तत्व में उर्जा की शक्ति को देखा जाता है जिसमें खाद्य का पाचन और मेटाबोलिज्म सम्मिलित है।
कफ या पानी तत्व में सर्दी, कोमलता, कठोरता, सुस्ती, स्नेहन और पोषक तत्वों के वाहक की विशेषता है।
आयुर्वेद के आठ अंग हैं जिसकी चर्चा संस्कृत महाभारत में भी की गयी है और इनका नाम संस्कृत में चिकित्सयम अष्टन्गायम के नाम से पाया गया है।

आयुर्वेद में पंचकर्म का भी खास महत्व है। पंच का अर्थ है ‘पांच’ और कर्म का अर्थ है ‘चिकित्सा’। यानि आयुर्वेद में पंचकर्म की मदद से शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकाला जाता है।

आयुर्वेद कोई ऐसा लेख नहीं है जो किसी एक ने लिखा था। यह एक ऐसी प्राचीन भारतीय चिकित्सा प्रणाली है जो सदियों से कई महापुरुष लिखते चले आ रहे हैं। वैसे तो आज तक आयुर्वेद पर कई लेख लिखे गए हैं लेकिन जो सबसे प्रमुख पौराणिक हैं उसमें- चरक संहिता, सुश्रुता संहिता और अष्टांग ह्रदय शामिल है। वैसे तो आयुर्वेद की शुरुआत अथर्व वेद से हुई जो चारों वेदों में से एक है। अथर्व वेद में ही आयुर्वेद की उत्त्पति के विषय में बताया गया है साथ ही इस वेद में यह भी स्पष्ट है कि ब्रह्मा ने ही आयुर्वेद का ज्ञान प्रजापति को दिया था। अथर्व वेद में ही तरह-तरह की प्राचीन दवाइयों के विषय में भी जानकारी दी गयी है। आयुर्वेद का सही रूप में विकास संहिता दौर में शुरू हुआ जब चरक संहिता लिखा गया। चरक संहिता को 6वीं सदी ईसापूर्व में लिखा गया था। चरक संहिता में ही सर्जरी का उल्लेख किया गया है।

आयुर्वेद प्राचीन भारतीय प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति है। आयुर्वेदिक इलाज में किसी भी प्रकार के रासायनिक पदार्थों या अप्राकृतिक पदार्थों का प्रयोग नहीं किया जाता। असल में आयुर्वेद में रोग प्रतिरोधक क्षमता को विकसित करने पर बहुत बल दिया जाता है। इलाज़ के दौरान रोगी को मूल चिकित्सा के साथ-साथ रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली औषधियों का भी सेवन करवाया जाता है। इन आयुर्वेदिक औषधियों का हमारे शरीर पर किसी भी प्रकार का दुष्प्रभाव नहीं पड़ता और यही कारण है की आयुर्वेदिक इलाज सुरक्षित और दुष्प्रभाव रहित माना जाता है। पिछले तीन सालों में मोदी सरकार ने आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए कई कारगर कदम उठाए हैं। सरकार के प्रयासों से आज आयुर्वेद सिर्फ चिकित्सा पद्धति नहीं है बल्कि इसका दायरा पहले से अब और बढ़ गया है। मोदी सरकार ने 9 नवम्बर 2014 को आयुष का एक अलग मंत्रालय बनाया। जिसके जिम्मे आयुर्वेद के साथ-साथ योग और प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होमियोपैथी को बढावा देना है। इसी साल धन्वंतरि जंयती के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश को पहले अखिल भारतीय आयुर्वेदिक संस्थान की सौगात दी है। इस मौके पर पीएम मोदी ने साफतौर पर कहा कि पिछले तीन सालों में जो हमारी विरासत है और जो श्रेष्ठ है, उसकी प्रतिष्ठा जन-जन के मन में स्थापित हो रही है। पिछले तीन सालों में 65 से अधिक संस्थान शुरू हुए हैं और वर्तमान में भी देश के हर जिले में आयुर्वेद से जुड़ी अच्छी सुविधा से युक्त अस्पताल बेहद जरूरी है जिसके लिए आयुष मंत्रालय तेजी से काम कर रहा है।

पीएम के मुताबिक आयुर्वेद सिर्फ एक चिकित्सा पद्धति नहीं है बल्कि इसके दायरे में सामाजिक स्वास्थ्य, सार्वजनिक स्वास्थ्य, पर्यावरण स्वास्थ्य जैसे अनेक विषय भी आते हैं। इसी आवश्यकता को समझते हुए सरकार आयुर्वेद, योग और अन्य आयुष पद्धतियों के पब्लिक हेल्थकेयर सिस्टम में इंटीग्रेशन पर जोर दे रही है।
देश के इस पहले अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान की स्थापना आयुष मंत्रालय के अंतर्गत की गई है। दिल्ली के सरिता विहार में स्थित ये संस्थान आधुनिक तकनीक से पूर्ण होगा। इसमें 25 स्पेश्यिलिटी डिपार्टमेंट है। इस संस्थान से पोस्ट ग्रेजुएट किया जा सकता है। देश को पहले अखिल भारतीय आयुर्वेदिक संस्थान के पहले चरण में 157 करोड़ का बजट लगा है। यह संस्थान देश में अनुसंधान, चिकित्सा के पारंपरिक ज्ञान और प्रोद्योगिकी के बीच तालमेल बिठाकर मरीजों के लिए सुविधाएं देगा।
सर्जरी से लेकर कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का इलाज आयुर्वेद के ग्रंथों में दर्ज है। वर्तमान में भी आयुर्वेद के माध्यम से लाइलाज बीमारियों को जड़ से खत्म किया जा सकता है। आयुर्वेद में पीलिया, पथरी, चर्मरोग, पेट के रोग, डायबिटीज,

अमरेन्द्र गुप्ता, वरिष्ठ पत्रकार, लोक सभा टीवी

किडनी, जोड़ों का दर्द, हृदय रोग तथा मानसिक तनाव दूर करने के कई उपाय हैं। आयुर्वेद के जरिए कैंसर जैसी घातक बीमारी से भी छुटकारा पाया जा सकता है। आज लोग अंग्रेजी इलाज से निराश-हताश होकर अंतिम उम्मीद लिए आयुर्वेद की ओर जा रहे हैं। अंग्रेजी दवाओं से कालांतर में दुष्प्रभाव की आशंका के मद्देनजर लोग सौंदर्य प्रसाधन से लेकर भोजन तक में हर्बल उत्पाद का प्रयोग करने लगे हैं। आज शायद ही कोई घर होगा जहां आयुर्वेद से जुड़ा एकाध उत्पाद न हो।
दादी-नानी की पिटारी और रसोई घर में साधारण बीमारियों से निपटने का नुस्खा आयुर्वेद ने दियालेकिन व्यापक होकर भी आयुर्वेद भारत में अब भी अपने गौरव को हासिल नहीं कर सका है। आज देश में आयुर्वेद को मजबूती देने की दिशा में सरकारी पहल शुरू हो चुकी है। हालांकि कुछ दिक्कतों के बावजूद आयुर्वेद जीवनशैली का अंग बन चुका है। बड़े-बड़े अस्पतालों में इसकी अलग से शाखाएं शुरू हो चुकी हैं। ऐसे में जरूरत है तो सिर्फ मानसिकता में बदलाव लाने की। सरकार के साथ-साथ अगर हम लोग भी आयुर्वेद को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता में शामिल कर लें तो शायद वो दिन दूर नहीं जब योग दिवस की तर्ज पर विश्व समुदाय विश्व आयुर्वेद दिवस मनाना शुरू करे और भारत अपनी सभ्यता की पहचान का प्रणेता बन सके।