पढ़ा-लिखा गधा

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इसमें शक की कोई बात न थी कि बीरबल दूर-दूर तक बड़े नामी-गिरामी थे। एक दिन वह अकबर के साथ दरबार में बैठे थे। तभी टैक्स चोरों से जब्त की गई चीजों में एक बड़ा गधा भी दरबार में हाजिर किया गया।
बादशाह को खुश करने के इरादे से बीरबल गधे की तारीफ के पुल बांधते हुऐ बोले-‘‘जहांपनाह! इसके चेहरे से ऐसी बुद्धिमानी फूट रही है कि शायद सिखाने पर ये पढ़ना-लिखना भी सीख जाए।’’
बादशाह ने उनकी बात पकड़ ली और सेवक को आदेश दिया कि वह गधे की रस्सी को बीरबल के हाथ में थमा दें।
फिर बादशाह ने बीरबल से कहा-‘‘यदि गधा इतना बुद्धिमान है तो इसे ले जाओ और महीने भर में पढ़ा-लिखाकर वापस ले आओ।’’
बीरबल को समझते देर न लगी कि यदि वह इस काम में विफल हो गए तो नतीजा क्या होगा।
ठीक एक महीने बाद उसी गधे की रास थामे बीरबल दरबार में हाजिर हुए। बादशाह ने पूछा-‘‘क्या गधा पढ़-लिख गया है?’’
‘‘हां, जहांपनाह!’’ कहते हुऐ उन्होंने एक मोटी-सी पोथी गधे के सामने रख दी।
गधा जुबान से पोथी के पन्ने पलटता चला गया और तीसवें पन्ने पर पहुंचकर जोर-जोर से रेंकने लगा।
बादशाह और सभी दरबारी चकित रह गए।
‘‘तुमने यह चमत्कार कैसे किया?’’ बादशाह ने पूछा।
बीरबल ने बड़ी शान के साथ समझाया-‘‘जहांपनाह! पहले रोज मैंने मुट्ठी भर घास पोथी की जिल्द और पहले पन्ने के नीचे रख दी।’’
दूसरे दिन मैंने घास दूसरे पन्ने पर रख दी और पोथी बन्द कर दी।
गधे ने उसे खोलकर घास खा ली। फिर रोजाना इसी तरह से आगे के पन्ने पलटने लगा, लेकिन जिस पन्ने पर घास नहीं मिलती तो गधा गुस्से में रेंकने लगता।