कुओं की अगवानी

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एक दिन अकबर बादशाह और बीरबल का किसी बात पर झगड़ा हो गया। बीरबल को गुस्सा आ गया, वह रूठकर दिल्ली से 15-20 कोस दूर पर एक गांव में अपना नाम छिपाकर रहने लगे। गांव का पटेल भगवत सिंह भाटी राजूपत था। वह बड़ा दयालु था। जो कोई परदेशी उस गांव में आता उसकी वह बड़ी आवभगत करता था। बीरबल भी उसके गांव में बड़े आराम से दिन बिताने लगे।
बीरबल के चले जाने के बाद अकबर बादशाह ने उनकी जगह पर अपने साले को नियुक्त किया। यह बात यद्यपि अकबर बादशाह को नापंसद थी, परंतु बेगम को खुश करने के लिए ऐसा करना उनकी विवशता भी थी।
उसको दीवान के पद पर नियुक्त हुए दस दिन भी न हुऐ थे कि शहर में अव्यवस्था फैल गई। लोग आपस में लड़ने-झगड़ने लगे। न्याय की परिपाटी बिल्कुल बिगड़ गई। चारों ओर से नालिशें होने का तांता लग गया।
कुछ समय बाद अकबर बादशाह ने बीरबल की खोज के उद्देश्य से गांव-गांव में यह आदेश भेज दिया कि दिल्ली में सरकारी कुंएं का विवाद है, इसलिए अपने गांव के सब कुओं को लेकर जो जमींदार नहीं आएगा, उस पर दस हजार रूपये का जुर्माना किया जाएगा।
अकबर बादशाह की यह आज्ञा जिस गांव में बिरबल रहते थे, वहां भी पहुंची। तब गांव के पटेल ने सब गांव वालों के एकत्रित किया और उनको अकबर बादशाह की आज्ञा सुनाई। फिर वह बोला-‘‘अकबर बादशाह बड़ा मूर्ख है, कहीं कुएं भी इस तरह से जा सकते हैं। आप बताओ, अब क्या किया जाए। क्योंकि बादशाह की आज्ञा का पालन न होगा तो दस हजार रूपये दण्ड के देने होंगे।’’
उस समय बीरबल भी वहां मौजूद थे। उन्होंने यह बात सुनकर सोचा-‘अकबर बादशाह ने मेरी खोज के लिए यह नई तरकीब निकाली है। अब किसी तरह प्रकट होकर उनकी तरकीब सफल करना उचित ही है और ऐसा करने से मेरा और अकबर बादशाह दोनों का महत्व प्रकट होगा।’ यह सोचकर उन्होंने कहा-‘‘पटेलजी, आप चिंता न करें, तरकीब मैं बताऊँगा। आपने इतने दिनों तक मुझे अपने गांव में शरण दी है, उसका मुझको भी तो प्रतिफल देना चाहिए। आप मुझे और अन्य दो-चार आदमियों को साथ लेकर दिल्ली चलें और वहां नगर के बाहर डेरा डालकर अकबर बादशाह को कहलवा भेजें कि हम अपने कुआं को लेकर नगर के बाहर आ पहुंचे हैं। आप अपने कुओं को अगवानी के लिए भेजिए।’’
यह सुनते ही अकबर बादशाह तुरन्त ताड़ गये कि ऐसा जवाब बीरबल के सिवा कौन दे सकता है, वह अवश्य ही इसी गांव में हैं। यह सोचकर उन्होंने पटेल से पूछा-‘‘तुम्हें यह बात किसने बताई, सच-सच बताओ?’’
पटेल ने कहा-‘‘कुछ दिनों से हमारे गांव में एक परदेशी आकर ठहरा हुआ है, उसी ने हमको यह युक्ति बताई और वह हमारे साथ आया भी है।’’
अकबर बादशाह ने उसका हुलिया पूछा तो पटेल ने उसकी सूरत, चाल-ढ़ाल आदि के बारे में सब बातें बता दीं। जिससे अकबर बादशाह को निश्चय हो गया कि अवश्य वह बीरबल ही हैं।
फिर अकबर बादशाह ने हाथी-घोड़े आदि बहुत-सी सवारियां बीरबल को लाने के लिए भेजीं। बीरबल बड़ी धूमधाम से नगर में आए। अकबर बादशाह ने बीरबल को पुनः दीवान पद पर नियुक्त कर दिया और पटेल ईनाम देकर विदा किया। बीरबल के आने के बाद आठ दिन में ही सारे शहर का प्रबंध पहले के समान ठीक हो गया है और किसी भी प्रकार की गड़बड़ न रही।