अकबर-बीरबल : सब्जी-चावल और भस्म

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एक बार एक फकीर ने अकबर बादशाह के पास आकर सब्जी (हरे पत्ते) भेंट की। उसके थोड़ी देर बाद ही बंगाल का एक पुजारी आया और उसने देवी के प्रसादी चावल और भस्म अकबर बादशाह को दिये। फिर दोनों व्यक्ति कुछ धन मिलने की आशा से एक कोने में खड़े हो गए। अकबर बादशाह ने पुजारी की भेंट देखकर काजी से पूछा-‘‘यह क्या है?’’
काजी ने कहा-‘‘जहांपनाह! चावल और खाक है।’’
अकबर बादशाह ने अपने मन में सोचा कि यह पुजारी मेरी गद्दी को खाक करने आया है। इसलिए नौकरों से कहा कि इसको धक्का, देकर निकाल दें।
फिर फकीर की लाई हुई चीज को देखकर पूछा-‘‘शाह साहब! क्या लाए हैं?’’
काजी साहब बोले-‘‘हुजूर! सब्जी लाए हैं।’’
अकबर बादशाह ने सब्जी का प्रिय नाम सुनकर फकीर को सौ रूपये इनाम में दिए और जाने का हुक्म दिया।
जिस समय यह कार्रवाई हुई उस समय बीरबल दरबार में उपस्थि न थे। दरबार से जाते समय पुजरी को बीरबल रास्ते में मिले। उसने सारी बातें बीरबल से निवेदन कीं। बीरबल उसको एक ओर खड़ा कर दरबार में गए। वहां पहुंचने पर उन्हें फकीर को इनाम मिलने और पुजारी को निकाले जाने का पता चला।
बीरबल ने अकबर बादशाह के पास जाकर कहा-‘‘हुजूर! बंगाल के पुजारी का अपमान कर आपने अनुचित काम किया है। जिसने आपकी गद्दी अमर रखने के शुभाशीर्वाद के साथ महाकाली का प्रसाद आपको दिया था, उसको आपने धक्के देकर निकलवा दिया और जिसने आपका सर्वनाश होने वाली वस्तु भेंट की, उसे आपने इनाम दिया, कैसे आश्चर्य की बात है? जरा सोचिए तो सही इसमें आपकी कैसी कीर्ति होगी।’’
अकबर बादशाह बोले-‘‘पुजारी ने भस्म और चावल दिए थे, जिसका यह अर्थ निकला कि मेरी गद्दी भस्म हो जाए। इसीलिए मैंने उसको दण्ड दिया था और फकीर ने सब्जी जैसी शुभ वस्तु दी थी। इसके कारण मैंने उसको ईनाम दिया था। मैंने यह काम बहुत सोच-समझकर किया था। आगे जैसी तुम्हारी राय हो तो वैसा ही किया जाए।’’
बीरबल बोले-‘‘हुजूर! यह तो आपने उल्टा अर्थ निकाला। बंगाल का महाविद्धान पुजारी कभी भी आपका अशुभ चिंतन नहीं कर सकता। उसने चावल इस अभिप्राय से दिये थे कि आपके राज्य में धनधान्य की वृद्धि हो और भस्म देने का प्रयोजन था कि आपके शत्रु भस्म हो जाएं। ये दोनों पदार्थ हमारे शास्त्र के अनुसार महाकाली के पवित्र प्रसाद हैं। आपने अपने शुभचिंतक को ऐसा दंड दिया और जिस फकीर ने सब्जी अर्थात सड़-गल जाने वाली या सर्वनाश होने वाली चीज दी, उसे आपने इनाम दिया।’’
यह अर्थ अकबर बादशाह को ठीक लगा और उसने ब्राह्मण को बुलाकर ईनाम देते हुए कहा-‘‘फकीर की लाई हुई चीज हमारे धर्म में पवित्र है। इसीलिए उसको सौ रूपये दिए गए हैं।’’
इस प्रकार बीरबल ने अपनी युक्ति से ब्राह्मण को भी पुरस्कार दिलवा दिया।