रूपया नहीं, एक सेर मांस

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दिल्ली में रामशरण नामक एक सेठ रहता था। उस जमाने में उसकी बड़ी धाक थी। संयोग से एक दिन उनके पास कई हुंडियां साथ-साथ आईं, जिनका रूपया चुकाने के लिए उसे तीन लाख रूपए की और आवश्यकता थी। उसके पास रूपया आने में पांच-छः दिन की देर थी। यह देखकर रामशरण अपने मुंशी को हुंडीवालों का हिसाब मिलान करने को कह स्वयं इधर-उधर रूपयों का प्रबंध करने के लिए घर से निकला।
उस समय रामशरण के मुकाबले में केवल एक ही महाजन था, जिसका नाम हरमोहन था। वह अत्यन्त कपटी तथा ईर्ष्यालु था। रामशरण को यह बात मालूम थी। मगर उसके सिवाय दूसरा कोई ऐसा व्यक्ति न था जो तीन लाख रूपये एक मश्त गिन सके। लाचार होकर रामशरण हरमोन के यहां गया और एक सप्ताह की मुद्दत पर तीन लाख रूपया उससे उधार मांगा। हरमोहन को जब इस बात का पता लगा तो उस की बांछें खिल गईं। वह सदैव रामशरण को नीचा दिखाना चाहता था। उसकी यह मंशा थी कि किसी तरह रामशरण हट जाए तो वह स्वयं दिल्ली का नगर सेठ बन जाए।
आज हरमोहन को अवसर मिला। उसने रामशरण से कहा-‘‘सेठजी! आप हमारे यहां पहले-पहले ऋण लेने आए हैं। इसलिए हम आपसे सूद वगैरह भी नहीं ले सकते। आप तीन लाख रूपए खुशी से हमसे ले जाएं किंतु आपको यह वायदा करना होगा कि यदि आपने एक हफ्ते से पूर्व ही अपना कुल रूपया वापस न कर दिया तो आपके शरीर में से एक सेर मांस जहां से हमारी तबीयत होगी काट लेंगे। इसमें किसी किस्म की यदि कोई आपत्ति हो तो अभी कह दें, अन्यथा फिर कुछ सुना नहीं जा सकता।’’
यह शर्त सुनकर रामशरण का माथा ठनका। वह हरमोहन के इसी तरह के कई निर्दयतापूर्ण कारनामों का हाल सुन चुका था। यह सब होते हुए भी वह रूपया लेने को मजबूर था। उसे उम्मीद थी कि हफ्ते के पूर्व रूपया अवश्य जमा हो जाएगा। यह सोचकर उसने इकरारनामे पर दस्तख्त कर दिए। रूपया उसे मिल गया, जिसे लाकर उसने हुंडी वालों को चुका दिया।
संयोग से रामशरण को बाहर से जो रूपया आ जाने की उम्मीद थी, वह न आ सका। इधर-उधर से तीन लाख रूपया तथा सूद इकट्ठा करके उसने हरमोहन के यहां भिजवाया।
आज ही हफ्ता पूरा हुआ था, पर वहां तो हरमोहन की नीयत पहले से ही दूसरी थी। उसने यह कहकर वे रूपये वापस कर दिए कि हफ्ते से पूर्व रूपया लौटाने का वादा था। मुद्दत बीत चुकी है। अत: एव शर्त के अनुसार अब वह एक सेर मांस लेगा और उसने अदालत में नालिश दायर कर दी।
रामशरण अदालत में हाजिर हुआ और न्यायाधीश से बोला-‘‘हुजूर! हरमोहन मेरी जान लेने पर ही उतारू है, अन्यथा मैंने तो रूपया ठीक उसी दिन, जिस दिन हफ्ता खत्म होने को था, भेज दिया था। लेकिन इसने वापस कर दिया और कहा कि एक हफ्ते के पूर्व ही मिल जाने पर अपनी शर्त के मुताबिक ऋण वापस ले लेता, किंतु समय बीत जाने पर वह बाध्य नहीं है।’’ रामशरण ने फिर कहा-‘‘हुजूर! स्वीकार करें तो मैं अब भी उसका रूपया मय सूद के देने को तैयार हूँ।’’
हरमोहन ने यह मानने से इंकार कर दिया।
न्यायाधीश ने शर्त के मुताबिक एक सेर मांस लेने का हुक्म हरमोहन को दिया। लेकिन रामशरण मांस देने को राजी न हुआ और उसने अपनी अपील अकबर बादशाह के दरबार में दायर की।
अकबर बादशाह ने ऐसी शर्त पहले कभी नहीं सुनी थी, उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। साथ ही जब उनसे इसका फैसला करने को कहा गया तो अकबर बादशाह ने उसी क्षण बीरबल को बुलाया और उन्हें न्याय करने की आज्ञा दी।
अकबर बादशाह का आदेश पाकर बीरबल ने हरमोहन को बुलवाया और उससे सच्चा हाल सुनाने के लिए कहा। जवाब में हरमोहन ने शर्त वाला इकरारनामा सामने रखकर कहा-‘‘मुद्दत खत्म हो चुकी है और रामशरण ने रूपया अभी तक अदा नहीं किया। अतएव इकरार के अनुसार एक सेर मांस इसके शरीर के किसी भी हिस्से से काट लेने का मैं हकदार हूँ।’’
बीरबल ने हरमोहन से का-‘‘क्या तुम्हें अपना कुल रूपया मय सूद के लेना कबूल है?’’
परन्तु हरमोहन तो जान का प्यासा था, न कि रूपयों का। उसने अस्वीकार कर दिया।
तब बीरबल बोले-‘‘मुझे न्यायाधीश का फैसला स्वीकार है, इसलिए हरमोहन रामशरण के शरीर में से एक सेर मांस ले ले, किन्तु यह ध्यान रहे कि शर्त वाले इकरारनामे में केवल एक सेर मांस के लिए ही लिखा है। इसलिए यदि मांस के साथ जरा भी खून गिरा तो हरमोहन का सपरिवार वध करा दिया जाएगा।’’
अब तो हरमोहन बहुत घबराया और उसने बिना ब्याज लिए अपना रूपया मांगा। बीरबल ने कहा कि इकरारनामें की शर्तें तो माननी ही पड़ेंगी।
अंत में जब हरमोहन बहुत रोया-गिड़गिड़ाया और अपनी करतूत के लिए क्षमा मांगी तो रामशरण ने, जो स्वभाव का दयालु और परोपकारी था, बीरबल से प्रार्थना की-‘‘हरमोहन को अब बुद्धि आ गई है, इसे कुछ ही दंड देकर छोड़ दिया जाए।’’
बीरबल ने इस पर तुरन्त आज्ञा दी हरमोहन अपनी लड़की का विवाह रामशरण के लड़के से करे और दंडस्वरूप उसे तीन लाख रूपए दहेज में दे। इसको हरमोहन ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। इस प्रकार बीरबल ने एक नेक और ईमानदार आदमी की जान बचाकर बेईमान को सबक सिखाया। अकबर बादशाह भी बीरबल के न्याय से बेहद प्रसन्न हुए।