बीरबल का न्यायः अशर्फीं ओर पेड़ की गवाही

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एक दिन एक वृद्ध सज्जन किसी आवश्यक कार्य से नगर के बाहर जा रहे थे। घर में सिवा उनके दूसरा कोई न था। उनके पास एक हजार अशर्फियां थीं, जिन्हें उन्होंने अपनी युवावस्था में बड़े परिश्रम से कमाकर बुढ़ापे में सुख-शांति से जीवन व्यतीत करने के लिए रख छोड़ा था। घर छोड़ने से पूर्व उनके सामने इन अशर्फियों की समस्या उपस्थित हुई। घर सूना था, अतएव उन्हें वहां रख छोड़ना उन्होंने उचित न समझा। परदेश में नकदी साथ लेकर जाने में जान का जोखिम था।
ऐसी स्थति में उन्होंने अपने एक युवक मित्र के यहां अशर्फियां रखने का निश्चय किया। तदनुसार अपने मित्र के पास जाकर अपना निवेदन किया। मित्र महोदय ने उनकी बहुत आवभगत की, अपनी ईमानदारी को छोटी-छोटी कहानियां भी सुनाईं। सारांश यह है कि वृद्ध सज्जन को काफी विश्वासपात्र बनाने की दृष्टि से जो कुछ भी कहते बना, उन्होंने कहा।
वृद्ध सज्जन तो यह चाहते ही थे कि वह अपने यहां उनकी अशर्फियां रख ले, ताकि उन्हें कोई फिक्र न रहे। आखिरकार वृद्ध सज्जन अशर्फियां मित्र के सुपुर्द करके जहां उन्हें जाना था, चले गए। कुछ दिनों बाद जब वह बाहर से लौटे तो अपने मित्र के यहां अशर्फियां वापस लेने गए। जब बूढ़े ने अपनी अशर्फियों का जिक्र किया और उनको वापस मांगा तो युवक मित्र ने साफ इंकार कर दिया और भौंहें चढ़ाकर कहा-‘‘ तुम दरिद्र के पास अशर्फियां कहां से आईं?’’
बूढ़े ने पहले तो यही सोचा कि मित्रवर हंसी कर रहे हैं। लेकिन जब मित्र का रंग-ढंग कुछ और देखा तो उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया कि वह अशर्फियां मार लेना चाहता है। अब तो बूढ़े ने बहुत ही गिड़गिड़ाकर उससे प्रार्थना की-‘‘देखो, मेरे पास सिवा इन अशर्फियों के और कुछ भी नहीं है। मैं तो आज से ही दर-दर का भिखारी बन जाऊंगा, आप भले आदमी हैं। मेरी परेशानी में काम आए हैं, फिर आपको ऐसी बात शोभा नहीं देतीं।’’
बूढ़े के इन वाक्यों से चिढ़कर युवक ने उसे धक्का देकर दो-चार भली-बुरी बातें सुनाकर अपने घर से बाहर निकाल दिया। बेचारा बूढ़ा रोता हुआ अपने घर आया और पास पड़ोस के लोगों से इस बात की चर्चा की। परन्तु कोई भी इस परेशानी में आश्वासन या किसी प्रकार की मदद न कर सका। अंत में जब उसे हालत से लाचार होना पड़ा तो उसने अकबर बादशाह के दरबार में फरियाद की।
अकबर बादशाह ने इस मामले का भार बीरबल को सौंप दिया। बीरबल ने पहले तो बूढ़े की बात सुनी और फिर उसके युवक मित्र की। दोनों पक्षों के बयान लेकर बीरबल ने वृद्ध सज्जन से पूछा-‘‘जिस वक्त वे अशर्फियां तुमने अपने मित्र को दी थीं, क्या उस वक्त वहां कोई मौजूद था?’’
वृद्ध सज्जन ने कहा-‘‘मैं था, मेरा यही मित्र था। हां, उस स्थान पर एक आम का पेड़ था, जिसकी जड़ पर हम दोनों बैठे थे, इसके अलावा तीसरा कोई नहीं था।’’
यह सुनकर बीरबल बोले-‘‘तब तो तुम्हें उस पेड़ के पास जाकर उससे सारा हाल कहना चाहिए तथा अपनी गवाही में उसे यहां लाना चाहिए। पेड़ यदि तुम्हारे कहने से न आए तो मेरा नाम लेकर कहना। यदि इतने पर भी न आए तो अकबर बादशाह का नाम लेकर कहना पेड़ तुरंत ही आएगा।’’
बीरबल की बात को बूढ़ा टाल न सका और पेड़ के निकट जाने को तैयार हुआ। अशर्फियां हजम करने वाला मित्र वहीं बैठा रहा।
जब बूढ़े को गए कुछ देर हुई तब बीरबल ने एकाएक युवक से पूछा-‘‘क्या बूढ़ा अब उस पेड़ के पास पहुंच गया होगा?’’
युवक ने अधिकारपूर्वक जवाब दिया-‘‘अभी नहीं, क्योंकि वहां जाने का मार्ग बहुत कंकरीला, पथरीली धरता तथा झाड़ियों से युक्त है, जिससे देर हो जाना स्वाभाविक है।’’
बीरबल यह सुनकर समझ गया कि अवश्य ही इसके पास अशर्फियां हैं। फिर भी बीरबल अपनी पुस्तक के पृष्ठ बराबर उलटते रहे। कुछ देर बात बूढ़ा वापस आया, उसके मुख पर निराशा छाई हुई थी। आते ही उसने बीरबल से अर्जी की-‘‘दीवान साहब! मैंने उस पेड़ से आपका, यहां तक कि अकबर बादशाह का नाम कई बार लेकर प्रार्थना की कि चल मेरी गवाही दे, लेकिन वह न डिगा, न उसने कुछ जवाब दिया।’’
तब बीरबल ने बूढ़े को बताया-‘‘जैसे ही तुम उसके पास पहुंचे, अपनी प्रार्थना उसे सुनाई तथा मेरा नाम उसे बताया, वैसे ही वह यहां आ गया और मुझे सारा हाल बता गया।’’
युवक, जो शुरू से अंत तक उन्हीं क पास बैठा था, आश्चर्य से पूछ बैठा-‘‘महाराज! पेड़ यहां कब आया था? यदि आता तो मैं भी देखता ही।’’
बीरबल बोले कि यह तो निश्चय ही है कि उस पेड़ के पास तुमने इस बूढ़े सज्जन की अशर्फियां ली हैं, क्योंकि ऐसा न होता तो तुम कैसे स्वीकार कर लेते कि पेड़ अभी दूर है, रास्ता भी ठीक नहीं है। इन सब बातों से स्पष्ट है कि अवश्य ही तुम उस पेड़ से परिचित थे और वह स्थान तुम्हें मालूम था। यदि ऐसा न होता तो तुम उसी वक्त आश्चर्य में आकर कहते-‘‘कौन-सा पेड़? अतः तुमने अशर्फियां जरूर ली हैं। यदि तुम भले आदमी हो तो अब ठीक-ठीक बता दो, अन्यथा तुम्हारे साथ भी अब वही सलूक किया जाएगा, जो चोरी करने वाले के साथ होता है।’’
वह कुछ उत्तर न दे सका। उसने अशर्फियों का लेना स्वीकार कर लिया। बीरबल की आज्ञा से युवक ने अशर्फियां बूढ़े को वापस दे दीं। इसके बाद बीरबल ने युवक को शासन विधान के अनुसार दण्ड दिलवाया।